
वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने इस धरती पर विध्वंस से लेकर विकास के क्रम को लगातार आगे बढ़ाया है और टेक्नॉलोजी में रात-दिन इम्प्रूवमेंट होता चलता चला जा रहा है। और जो वास्तविक सुख थे उनकी जगह आजकल गैजेट और टेक्नॉलोजी में जो इम्प्रूवमेंट आ रहे हैं उन्हें सुख की संज्ञा दे दी गई है। यानि भौतिक रूप से जो आप संसाधन जुटा रहे हैं वही सुख के मानक हैं, सुविधाओं को एक तरह से सुख का प्रतिबिम्ब बना दिया गया है, सिनोनिम पर्यायवाची बना दिया गया है। विकास की बात और टेक्नॉलोजी में परिवर्तन की बात एक जगह रही, लेकिन क्या कोई भी डॉक्टर और इंजीनियर शरीर से बाहर रक्त की एक बूंद भी बनाने में सक्षम हो पाया है? या सफल हो पाया है क्या? अभी तक तो नहीं हो पाया और आने वाले कुछ वर्षों में ये सफल होता हुआ नजर आ भी नहीं रहा है। ये तो बहुत दूर की बात है। कोई व्यक्ति यदि बी-पोजिटिव ब्लड ग्रुप से बिलांग करता है तो क्या उसे ओ पोजिटिव ब्लड चढ़ाया जा सकता है। सामान्य जनमानस मना कर देगा कि साब कि ये संभव नहीं है। समानता-सिर से देखनी पड़ेगी यानि कि इसीलिए मंगल से मंगल का मिलान इतना अधिक आवश्यक है इस नवग्रहीय व्यवस्था में और रक्त के कारक होते हैं यूनिक एप्रोच इंटरेसिक क्वालिटि लिए हुए होते हैं ग्रहों के सेनापति, भूमि सूत मंगल। मंगल जिनकी दृष्टि में ताप है क्योंकि सेनापति हैं और ताप उन्हीं एक वजह और है कि ये भूमि सूत हैं। आप आकाश तत्व की और जैसा आगे बढ़ते हैं वैसे-वैसे ठंडक है। और आप जब भूमि के भीतर जाना शुरू करते हैं तो गर्मी का प्रभाव, ताप का प्रभाव लगातार बढ़ता चला जाता है और व्यक्ति के लिए वहां पर खड़े रहना भी संभव नहीं होता तो उस ताप के अग्नि तत्व प्रधान होते हैं मंगल। तो मंगल जहां भी दृष्टि डालेंगे वहां पर ताप देंगे। इस वजह से मंगल की दृष्टि को तापीय दृष्टि भी कहा गया है इन्हें दो विशेष दृष्टियां प्राप्त हैं सप्तम के अलावा चतुर्थ और अष्टम। तो जब भी हमारे घर में जातक जन्म लेता है और ज्योतिषाचार्य ने ये कहा कि बच्चा मंगली है श्रीमान। तो पूरा घर चिंताओं में लग जाता है कि बच्चा मंगली है तब ये ब्लड लोसेज बहुत करेगा, एग्रेसिव बहुत रहेगा, एंग्जायटी और एंसयनेस बहुत ज्यादा रहेगी। यदि विवाह के समय कुंडली नहीं मिलाई तो इसका गृहस्थ जीवन तो हो गया चौपट ये ही समझना चाहिए। ये सारी की सारी परिभाषाएं हमें गफलत में और एक तरह से वहम में गुजारने का कार्य करती है। मंगल के लिए कहा जाता है कि लग्न कुंडली ये बिलकुल सार्वभौमिक सत्य है कहा क्या जाता है लग्न कुंडली, चन्द्र कुंडली इसके अलावा आजकल सूर्य कुंडली से भी यानि सूर्य लग्न से भी और शुक्र लग्न से भी लोगों को मंगली करार दे दिया जाता है तो श्रीमान इस तरह की व्यवस्था देखी जाए तो शायद ही पृथ्वी पर कोई व्यक्ति बचेगा जो मंगली न हो। सिर्फ लग्न कुंडली से यानि जो आपके देह के मंदिर में आत्मा निवास कर रही है उससे और इसके साथ में चन्द्र कुंडली के मन के कारक हैं चन्द्रमा। इन दोनों से ही जातक को मंगली करार दे दिया जाता है इसके अलावा मंगली व्यक्ति को नहीं कह सकते। अब एक, चार, सात, आठ और बारह प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश में ही जातक को मंगली क्यों कहा जाता है यहां पर बैठकर जब मंगल अपना प्रभाव दिखाते हैं तो मंगली क्यों कहा जाता है इसके बारे में चर्चा करना बहुत अधिक आवश्यक है। जब मंगल लग्न स्थान में बैठते हैं तो सातवीं दृष्टि से गृहस्थ भाव को देखते हैं और इसके साथ में जब चतुर्थ स्थान में बैठते हैं तब भी चौथी दृष्टि से सप्तम भाव यानि गृहस्थ भाव को देखते हैं। द्वादश में बैठते हैं तब भी आठवीं दृष्टि से सप्तम भाव को ही देखते हैं। अब यह तो रही एक, चार, सात और बारह की बात थी यहां पर गृहस्थ भाव में इतने डिफरेंसेंज डालते हैं इसलिए जातक को मंगली कहा जाता है लेकिन इसमें अष्टम भाव को क्या शुमार किया जाता है। अष्टम भाव को शुमार करने के पीछे कारण है कि महिला की कुंडली में अष्टम भाव उसके सौभाग्य का कारक है। यानि जब मंगल आठवीं दृष्टि से यहां देखेंगे या फिर यहां विराजेंगे तो वो सौभाग्य के भाव में बैठे होंगे महिला के हिसाब से। इसलिए अष्टम स्थान को भी इस मंगली परिभाषा के अंदर केलकुलेट किया जाता है। ये तो रही एक बात। अब समानता सीर से समानता सीर का मिलान बहुत ही अधिक आवश्यक है। रक्त का कोई भी दूसरा सब्सिच्यूट अवेलेबल नहीं है इसलिए मंगल से राहू का मिलान नहीं हो सकता सप्तम अष्टम में कई बार राहू बैठे हुए होते हैं तो मिलान कर देते हैं। राहू विच्छेदी कारक ग्रह हैं। राहू षड प्लेनेट है और पृथकतावादी ग्रह है इसके एंड रिजल्ट ये शनि वतफल जरूर करते हैं और एंड रिजल्ट पोजिटिव नहीं है इसलिए इनसे मिलान संभव नहीं है। शनि से भी मंगल का मिलान संभव नहीं है। मंगल और गुरु जब साथ में बैठते हैं तो कह दिया जाता है कि ये जातक मंगली ही नहीं है। ये किसने कह दिया आपसे। मंगल जब गुरु के साथ बैठेंगे तो गृहस्थ भाव में और ज्यादा पीड़ा देने का कार्य करेंगे इस बात को ध्यान रखने की बहुत ही अधिक आवश्यकता है। कुछ आजकल डिवाइडेट एप्रोच और एलिमा और कन्फयूजन और भी चल रहे हैं उसमें कहा जाता है कि जातक डबल मंगली है। डबली मंगली जैसी कोई भी परिभाषा नहीं होती। 28 वर्ष के बाद मंगल का मिलान करना ही नहीं चाहिए। क्यों 28 वर्ष के बाद के सौरमंडल से मंगल गायब हो जाते हैं या फिर 28 वर्ष के बाद मंगल हमारा प्रभाव, हमारे जीवन से अपना प्रभाव, हमारे जीवन से हटा देते हैं। ऐसा कतई संभव नहीं है हमारे जीवन में जो एग्रेसन बना हुआ है, पैशन बना हुआ है लगातार स्वप्रेरणा बनी हुई है और इसके साथ में जो रक्त संचारित हो रहा है वो एक क्षण के लिए भी रुकता नहीं है। लगातार चलता चला जाता है। इसलिए 28 वर्ष के बाद जिस गफलत में उलझाया जाता है कि मंगल का प्रभाव समाप्त हो जाता है ऐसा बिलकुल भी नहीं है। अब बच्चे को क्रोध बहुत अधिक आएगा ये कहा जाता है जब जातक मंगली हो तो। वो सिर्फ लग्न स्थान से ही देखना चाहिए यदि लग्न में मंगल विराजे हुए हैं तो जातक को अधिक क्रोध आएगा क्योंकि देह का स्थान है और यहां पर वो ब्लड के प्रेशर को बढ़ाने का कार्य करेंगे इस वजह से यहां पर ये ध्यान रखने की आवश्यकता है कि जब बच्चा एग्रेसिव है तो उसका स्टेमना बड़ा ही शानदार है। बार-बार इरिटेड हो रहा है आप उसे डॉक्टर और इंजीनियर बनाना चाह रहे हैं जबकि उसका स्टेमना कह रहा है कि मैं एक स्पोर्टस पर्शन हूं, मुझे स्पोर्टस की तरफ भेजिये। यदि लग्न में और पंचम में मंगल बैठे हुए हों ये हमारे विषय से संबंधित जानकारी नहीं है। लेकिन बीच में चर्चा आ गई तो मैं बता रहा हूं। लग्न और पंचम स्थान में यदि मंगल बैठे हुए हों और अच्छी पोजीशन में बैठे हुए हों तो वो स्टेमना को बढ़ाने का कार्य करते हैं इस वजह से आपको ऐसे व्यक्ति को स्पोर्टस की तरफ या फिर किसी ऐसे कार्य की तरफ भेजना चाहिए जहां पर स्टेमना की बहुत ही अधिक आवश्यकता हो, दृढ़ता की और सामने खड़े होने की बहुत अधिक आवश्यकता हो। तो ये रही एक बात। अब जब मंगल विवाह में विलम्ब कर रहे हैं, मंगल विवाहित स्थितियों में कुछ न कुछ न्यूनता लेकर आ रहे हैं। जातक को क्रोधी बहुत अधिक बना रहे हैं तो इसके लिए क्या उपाय करना चाहिए। ये तो रही मंगली जातक की बात। मैं बात करता हूं उपाय की। उससे पहले एक छोटा-सा सवाल आपसे है। यदि कोई 70 वर्षीय व्यक्ति है जिसने जीवन में एक ओहदा प्राप्त किया है, एक जगह बनाई, अपना नाम खड़ा किया, सम्मान के साथ में जिंदगी जी, अनडेब्लेमेज्ड अपनी छवि को रखा यानि एक दाग भी नहीं लगने दिया। तो क्या ऐसे व्यक्ति को कोई पच्चीस वर्षीय, तीस वर्षीय व्यक्ति या पचास वर्षीय प्रौढ़ उससे नाम लेकर बात कर सकता है या तू या तुम कह कर बात कर सकता है। आप कहेंगे जी नहीं। उससे सम्मानपूर्वक बात ही करनी पड़ेगी, हाथ जोड़कर, जी लगाकर बात करनी पड़ेगी। लेकिन यदि उसकी मां जीवित है ऐसे व्यक्ति की 95 वर्षीय मां जीवित है तो वो उनको कान पकड़ कर कंट्रोल भी कर सकती है। नीचे भी बैठा सकती है और उन्हें समझा भी सकती है। तो जो ग्रहों के सेनापति हैं उन्हें कंट्रोल करने का कार्य करते हैं सृष्टि के सेनापति। सृष्टि के सेनापति हैं कार्तिकेय। शिव के पुत्र कार्तिकेय जिनकी दक्षिण में बहुत अधिक पूजा की जाती है। शिव परिवार में सम्मानीय स्थान है कार्तिकेय का। तो ग्रहों के सेनापति को आधिपति देव के रूप में कार्तिकेय कंट्रोल करने का कार्य करते हैं। अब इनकी उपासना हमें कैसे करनी चाहिए। सोमवार के दिन, मंगलवार के दिन, प्रदोष के दिन विशेष तौर पर जब भी मंगल प्रदोप आता है तो उस समय मैं एक मंत्र बताने जा रहा हूं ये अचूक रामबाण अस्त्र है। इसको आप यदि उपासना पद्धति में लेकर आते हैं और कार्तिकेय की पूजा करते हैं तो मंगल संबंधित व्याधियां जिनसे आप जूझ रहे हैं, भले ही विवाह में विलम्ब हो रहा हो, विवाह में विलम्ब के बाद में यदि न्यूनता आ रही हो, न्यूनता आने के साथ में जातक बहुत अधिक क्रोधी रह रहा हो, ब्लाड प्रेशर की पोजीशन इधर-उधर हो रही हो तो कार्तिकेय की पूजा करने के साथ में इस मंत्र का जाप एक माला यानि एक सौ आठ बार या फिर दो माला के रूप में करना चाहिए। आपको सवा महीने के भीतर ही चमत्कारिक याद रखिये चमत्कारिक प्रभाव देखने को मिलेंगे। ये मंत्र है- ऊँ तत्पुरुषाय विद्ममही महा सैनाय धीमहि तनो क्षणमुख प्रचोदयात। ऊँ तत्त्पुरुषाय विद्ममही महा सैनाय धीमहि तनो क्षणमुख प्रचोदयात। इस मंत्र का यदि 108 बार जाप करे जातक तो इसके स्पंदन से जो कासमॉस से जो इस मंत्र का प्रभाव उस आकाशीय तत्व तक पहुंचता है तो मंगली जातक को काफी हद तक रिलीफ मिलने का कार्य होता है। मूंगा पहनना अपनी जगह है। दूसरे उपचार करना अपनी जगह है, लेकिन कार्तिकेय जो कि शिव परिवार में पूजनीय स्थान रखते हैं। यदि उनकी उपासना इस तरह से की जाए तो मंगली जातक को बहुत ही अधिक लाभ होता है। तो ये थी मंगल के बारे में चर्चा। किसी भी गफलत को अपने मन में स्थान नहीं दें। याद रखिये, वहम आपके मन में बसा हुआ वो पौधा है जिससे यदि डर की खाद लगातार मिलती रहे तो वो दिन दूनी और रात चौगुनी प्रगति करता है। उसे अपने मन से हटाइये। यहां पर सकारात्मक सोच को स्थान दीजिये। प्रगतिशीलता को वो स्थान दीजिये जहां समस्याएं हैं वहां समाधान है ही है और कार्तिकेय भगवान मंगल की इन सारी की सारी व्याधियों के समाधान अपने भीतर समाहित किये हुए हैं। तो इस पूजा पद्धति के अनुसार आप आगे बढिय़े और मंगली जातकों के जीवन में मंगल ही मंगल होगा अमंगल नहीं।
Comments
Post a Comment