
नमस्कार दर्शकों। हार्दिक अभिनन्दन। मैं वैभव व्यास स्वागत करता हूं आपका इस कार्यक्रम में। दोस्तों, जिन्दगी में फेम कौन नहीं चाहता। अपना नाम ऊंचाइयों पर खड़ा करना कौन नहीं चाहता। पद, मान और प्रतिष्ठा कौन नहीं चाहता, हरेक व्यक्ति चाहता है कि वो गली-मोहल्ले, अपने शहर, अपने प्रदेश, अपने देश में एक अलग पहचान बनाए ख्याति के रूप में लोग उसे जानें यदि वो 8-10 लोगों के समूह में खड़ा है तो हरेक आदमी उसका आदर और सम्मान करे। यह भावना प्रत्येक व्यक्ति के मन में रहती है भले ही वो अच्छे से अच्छा ज्ञानी पुरुष हो या भले ही सड़क पर चलता हुआ वो व्यक्ति जो अपने जीवन के संघर्षों को पूरा कर रहा है, हरेक कि कामना रहती ही रहती है। जब ज्योतिषीय माध्यम से इस बारे में बात की जाती है कि चन्द्र और मंगल की युति विशेष तौर पर बताया जाता है कि यदि गुरु कुंडली में चन्द्र और मंगल की युति है तो व्यक्ति विशेष तौर पर ख्याति अर्जित करेगा अपने व्यक्तित्व और अपने नाम को एक स्तर पर स्थापित करेगा। इसके विपरीत जब गुरु और राहु को एक साथ में किसी भी हाऊस में बैठा हुआ देखा जाता है 12 भावों में से तो कहा जाता है कि साब ये चांडाल दोष है और गुरु और केतु के बारे में भी यही बात की जाती है कि ये भी चांडाल दोष का ही निर्माण करते हैं जबकि इसके उलट गुरु और केतु दोनों ध्वज योग का निर्माण करते हैं। आप कहेंगे कि साब ये बिलकुल आप सरासर नई बात लेकर आएं हो इसका अस्तित्व और प्रमाण क्या है? मैं हमेशा कहता हूं जब किसी भी ग्रह की बात करें तो उनकी मूलभूत प्रकृति की, उनके गुणों की बात की जाये वो जीवन पर क्या प्रभाव डालते हैं उसकी बात की जाये तो अच्छे से समझ में आ सकता है कि कौन से हाउस में या कौनसी युतियां क्या प्रभाव डालती हैं। गुरु जहां ज्ञान के कारक हैं, विद्या के कारक हैं, संतान के कारक हैं, जीवन में संयम, शांति और समझदारी के कारक हैं वहीं केतु ध्वज के पर्यायवाची हैं। यानि कि संस्कृत में केतु का पर्याय माना गया है ध्वज को। ध्वज यानि विजय का प्रतीक, ध्वज यानि विद्रोह का प्रतीक। विद्रोह भी आपको जिन्दगी में आपको उतना ही फेम देता है जितना कि विजय। यदि विद्रोह सही समय पर किया जाए तो वो भी एक तरह से व्यक्ति के परचम को ऊपर लहराता ही लहराता है। मंदिर के ऊपर जब ध्वज को लहराते हैं तब वो उसके देवत्व के गुण को और ज्यादा बढ़ा देती है और आकाश की ओर जो आकाशतत्व है उस ओर ध्वजा लहराती हुई दिखाई देती है। एक तरफ से निश्चित तौर पर विजय का प्रतीक। जब ये ज्ञान के कारक ग्रह हैं जो कि देव गुरु भी हैं और उनके साथ जब केतु आकर बैठ जाएंगे, तो निश्चित तौर पर मान कर चलें कि वो व्यक्ति के ख्याति में इजाफा करेंगे ही करेंगे। अब इन 12 भावों में गुरु और केतु की यदि युति बन रही है तो वो किस तरह के रिजल्ट करती है। आज मैं यहां ये चर्चा करने के लिए आपके सामने उपस्थित हूं। गुरु और केतु की यदि युति लगन स्थान में जो कि देह का भाव है आत्मविश्वास का भाव है यदि वहां गुरु और केतु की युति बनती है तो व्यक्ति को सामाजिक कार्यों में काफी हद तक सक्रिय करती है व्यक्ति अपने संयमित गुणों और आचार-विचार के माध्यम से जाना जाता है अब जब यहां गुरु और केतु की बात की जाती है जब हम गुरु और केतु की बात करते हैं तो अपने आप ही डिफाल्ट एप्रोच में सप्तम स्थान में राहु बैठे हुए होते हैं और राहु अपने दुष्प्रभावों के कारण जिस हाऊस में बैठते हैं उससे भयाक्रांत व्यक्ति को रखते ही रखते हैं। अब गुरु लगन स्थान में बैठे हुए हैं चाहे द्वितीय या तृतीय कहीं भी बैठे हुए हैं और केतु की युति बन रही है साथ में तो वो राहु के सारे के सारे दुष्प्रभावों को अपनी सात्विक दृष्टि से कंट्रोल करने का कार्य निश्चित रूप से करेंगे। तो जब लगन स्थान में युति बनती है और सप्तम स्थान में राहु विराजते हैं तो राहु के पूरे के पूरे दुष्प्रभावों को कंट्रोल करने का कार्य करते हैं यहां बैठकर गुरु। इसके साथ में केतु जो कि ड्रेगन्स टेल है और लगातार वक्र गति से अपने थर्ड रूपी संस्थिति में लगातार इस क्रॉसमॉस के अन्दर, इस ब्रह्माण्ड में चलायमान है अपनी एक रफ्तार के साथ में तो लगन स्थान में बैठकर जल्दबाजी देते हैं गुरु इस अवगुण को पूर्ण रूप से केतु के कंट्रोल करके रखते हैं सैकिण्ड हाऊस जो कि धन-वाणी और कुटुम्ब का हाऊस है इन तीनों का हाऊस माना गया है सैकिण्ड हाऊस को। इस हाऊस में जिसके कारक भी है गुरु। यहां जब गुरु और केतु साथ बैठते हैं तो व्यक्ति की वाणी, ओज में एक अलग तरह की प्रखरता दिखाई देती है। व्यक्ति जब किसी ज्ञाना विषय की बात करने लगता है तो एक अलग ही अनूठे अंदाज में करता है उसके ओज से लोग प्रभावित हुए बिना रह ही नहीं सकते। यहां जब कुटुम्ब के हाऊस में गुरु बैठते हैं तो जहां आजकल भाई से भाई जुड़ कर नहीं रह पाते, व्यक्ति को सैकिण्ड हाऊस में बैठकर गुरु कुटुम्ब में एक अलग स्तर की ख्याति दिलाते हैं। अब बात करते हैं पराक्रम स्थान की। पराक्रम स्थान में यदि गुरु और केतु की युति बन रही है तो यहां बैठकर गुरु भाई-बहिनों के बीच में एक सर्वमान्य एप्रोच बनाते हैं व्यक्ति की उसकी प्रतिष्ठा और उसके पराक्रम को निरन्तर बढ़ाते हैं और केतु यहां यदि विराजमान है तो केतु उस ख्याति में चार चांद लगाने का कार्य करते हैं। भाग्य स्थान में जब राहु बैठे हुए हैं तो उनके दुष्प्रभावों को यहां अपने आप ही गुरु अपनी सात्विक दृष्टि से कंट्रोल करते चले जाएंगे। चतुर्थ स्थान जो कि द्वितीय केन्द्र है। केन्द्र जो कि सुख स्थान माना गया है, माता का स्थान माना गया है, भूमि का स्थान माना गया है चतुर्थ स्थान। इस स्थान में बैठकर गुरु व्यक्ति को सारे सुखों से अवगत करवाते हैं और उससे सुखी जीवन की ओर लगातार अग्रसर करते हैं। यहीं बैठकर दशम स्थान में जब राहु आपको किसी न किसी कला के क्षेत्र में महारथ देते हुए होते हैं तो गुरु और केतु चतुर्थ स्थान के अन्दर बैठकर सुख स्थान के अन्दर बैठकर आपकी ख्याति कला की ओर ले जाने का कार्य करते हैं, ऐसे जातक को, ऐसे व्यक्ति को कला के क्षेत्र में नाम कमाने की ओर आगे जाना चाहिए। याद रखियेगा यदि गुरु और केतु चतुर्थ स्थान आपकी कुंडली यदि आपके पास में हो चतुर्थ स्थान में गुरु और केतु की युति बन रही हो दशम स्थान में राहु बैठे हुए हों जो कि दशम स्थान, कर्म स्थान में बैठकर व्यक्ति को कला से जोड़ते ही जोड़ते हैं तो निश्चित तौर पे व्यक्ति को इस कला के स्पेशिफिक्स क्षेत्र में ख्याति मिलती ही मिलती है। पंचम स्थान जो कि शिक्षा का स्थान है। मैं पहले भी कह चुका हूं कि मंगल और गुरु, मंगल पराक्रम स्थान में और गुरु पंचम स्थान में बैठकर कार्य को भावनाशय की डेफिनेशन को एक तरह से नकार देते हैं। पंचम स्थान में गुरु कारक भाव का नाश नहीं करते वरन् व्यक्ति को शिक्षा के क्षेत्र के अन्दर उच्चता की ओर लेकर जाते हैं केतु यहां बैठे हुए हों तो व्यक्ति अनुसंधान की तरफ जाता है और इस अनुसंधान के साथ-साथ व्यक्ति बहुत ही अच्छे से अपने जीवन का यापन करता है राहु लाभ स्थान में बैठे हुए हों जब पंचम स्थान में गुरु और केतु है राहु लाभ स्थान में है वो व्यक्ति के पुण्य फलों को उदय करने का कार्य करते हैं। लाभ स्थान के स्थान में बैठा हुआ कोई ग्रह व्यक्ति के पुण्य फलों को उदित करने का कार्य निश्चित तौर पर करता ही करता है। केतु पोस्ट मेरिटल लाइफ में पंचम स्थान में बैठके व्यक्ति कि पत्नी को या स्त्री है तो उसको मिसकेरेज और अब्रोशन की पोजिशन की तरफ निश्चित तौर पर लेकर जाते हैं यानि संतान उत्पत्ति में कहीं-न-कहीं बाधा उत्पन्न होती है। षष्ठ स्थान जो कि रोग स्थान है रोग स्थान की अच्छी नहीं मानी गई है इसके पीछे कारण ये है कि रोग स्थान में यदि गुरु विराजे हुए हैं तो वो व्यक्ति को पेट संबंधी दिक्कतें देते हैं, लीवर संबंधित दिक्कतें देते हैं। मोटापे की समस्या से ऐसा व्यक्ति परेशान रहता है, लेकिन इसके साथ में षष्ठ स्थान में केतु बैठकर रोग को और शत्रु हंता योग बनाने का कार्य करते हैं, लेकिन स्त्री की कुण्डली में विशेष तौर पर ध्यान रखना चाहिए कि गुरु यदि षष्ठ भाव में बैठे हुए हैं तो स्त्री को ट्यूब संबंधी परेशानियां शादी के बाद सामने आती ही आती है जब वो कंसिवंग पोजीशन की तरफ पहुंचते हैं तो कई बार हम यह कहते हैं कि आप षष्ठ स्थान में गुरु बैठा हुआ है आप चैक करवाइये ट्यूब प्रोबलम तो नहीं है तो अमूमन ये प्रोबलम निकलकर सामने आती है जिसका विशेष तौर पर ध्यान रखना चाहिये। सप्तम स्थान जो कि पार्टनर बिजनस पार्टनर और लाइफ पार्टनर का स्थान है यहां बैठकर गुरु और केतु व्यक्ति को बिजनस में तो बुलंदियां देते हैं कार्य क्षेत्र में तो बुलंदियां देते हैं लेकिन यदि स्त्री की कुंडली में गुरु या सप्तम स्थान में विराजे हुए हैं क्योंकि स्त्री की कुंडली में सप्तम स्थान का कारक गुरु को माना गया है। याद रखिये पुरुष कि कुंडली में शुक्र है तो सप्तम स्थान स्त्री की कुंडली में गुरु को इस भाव का कारक माना गया है यहां बैठकर गुरु कारक भाव का नाश करने का कार्य निश्चित तौर पर करते हैं व्यक्ति के व्यक्तित्व में जरूर निखार रहता है क्योंकि यहां से सातवीं दृष्टि में गुरु लगन स्थान को देखते हैं गुरु और केतु की युति बिजनस के हिसाब से किसी स्पेसिफिक्स फील्ड के हिसाब से अच्छी है, लेकिन वैवाहेतर संबंधों में ये युति कतई अच्छी नहीं मानी जा सकती है। नवम दृष्टि जब यहां से सप्तम स्थान से पराक्रम स्थान पर पड़ती तो व्यक्ति के पराक्रम में भी निश्चित तौर पर वृद्धि होती है। लेकिन मैंने जैसा बताया पोस्ट मेरिटल अफेयर्स उस पर विशेष तौर पर ध्यान रखने की आवश्यकता रहती है। अष्टम स्थान जो कि हिडन हाऊस है इस हिडन हाऊस में गुरु बैठ कर व्यक्ति को पूर्ण विद्याओं से जोड़ते हैं उसके साथ में जब आपके पास में यदि कुंडली है और केतु अष्टम स्थान की तरफ बैठे हुए हैं तो बचपन में आप देख लीजिएगा कि आप किसी भी व्यक्ति से पूछते हैं कि कुंडली की कंफर्मेशन है कि एक से दो घात अपने बचपन के समय में सहन करता ही करता है यानि कि समय ऐसा आता है कि लगता है कि प्राण अब गए या अब गए। लेकिन व्यक्ति अपने जीवन यापन को निश्चित तौर पर आगे बढ़ाता ही बढ़ाता है। गुरु यहां बैठकर उन विद्याओं से व्यक्ति को जोड़ते हैं लेकिन यहां भी वो मोटापे संबंधी दिक्कतें, पेट संबंधी दिक्कतों से परेशान रखते हैं ये दूसरा तृक भाव है इस वजह से। नवम स्थान जो कि भाग्य और आध्यात्म का स्थान है यहां बैठकर गुरु और केतु व्यक्ति को कथावाचक तक की श्रेणी में उपस्थित करवा देते हैं। व्यक्ति का ज्ञान इतने पीक स्तर पर होता है कि वो कथावाचक की श्रेणी तक पहुंच जाता है। आध्यात्म में जिस स्तर पर व्यक्ति उन्नत से उन्नत स्तर को हासिल करता है। दशम स्थान जो कि कुंडली में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है यहां बैठकर गुरु दशम स्थान में कब्ज स्थान में बैठकर गुरु व्यक्ति को सर्विस ओरियन्टेड एप्रोच देते हैं और केतु जब स्थिति के अंदर यहां बैठे हुए हों तो व्यक्ति सी.ए., और सी.ई.एफ., एम.डी. लेवल तक की एप्रोच तक पहुंचता है यदि वो इस क्षेत्र में लगातार अग्रसर रहे तो। अब बात करते हैं लाभ स्थान की। यहां भी कारक होते हैं गुरु। लाभ स्थान में गुरु व्यक्ति को जितने जीवन में लाभ है उन सभी से जोड़ते हैं उन सभी के लाभ से परिपूर्णता के साथ व्यक्ति को आगे बढ़ाते हैं। केतु लाभ स्थान के अंदर वैसे भी पापी ग्रह को पुण्य फïलों के उदय करने वाले जिसमें राहु के एक्जाम्पल में एकादश स्थान में बैठते हैं तो बताया वैसे ही यहां केतु भी बैठकर व्यक्ति कोपुण्य फलों के उदय करवाने में मदद करते हैं। अब बात आई व्यय स्थान जो कि तृतीय तिकृ स्थान भी है यहां बैठकर केतु अपनी स्वाभाविक स्थिति में होते हैं और मोक्ष के कारक बनते हैं। यहां बैठकर केतु मोक्ष के कारक बनते हैं। मोक्ष के कारक बनने से व्यक्ति के जितने जीवन में मोह के क्षरण होते हैं धीरे-धीरे हो जाते हैं उसके बाद में व्यक्ति के जीवन काल के बाद मोक्ष की ओर अग्रसर होता है और ट्रेवल्थ हाऊस में गुरु बैठकर एक्सपेंशज पर पूर्ण रूप से कंट्रोल रखते हैं दूसरे जितने भी खर्चे हैं उन पर पूर्ण रूप कंट्रोल रखते हैं। पांचवीं दृष्टि से सुख स्थान को देखते हैं तो व्यक्ति के सुख में निश्चित रूप से इजाफा करते हैं तो ये रही गुरु और केतु के माध्यम से आपकी कुंडली में यदि ये युति बन रही है तो निश्चित तौर पर मानके चले कि यदि वो अच्छे स्थान में है तो आपको निरन्तर ख्याति देगी ही देगी आपका जीवन प्रगतिशील रहे, आप निरन्तर उन्नति करते रहें और इन युतियों का आपके जीवन में क्या प्रभाव पड़ता है ज्योतिष जीवन को किस तरह सुगम कर सकती है। ज्योतिष आपके जीवन चक्र को कैसे लगातार आगे बढ़ा सकती है इसके बारे में मैं आपसे निरन्तर बात करता रहूंगा।
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