
ज्योतिष विज्ञान के माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति अपने भावी जीवन के बारे में बहुत कुछ जान लेना चाहता है। शायद आप भी एपिसोड देख रहे हैं उसकी भी वजह यही है कि जो युतियां हमारी कुंडली में बनती है वो किस तरह हमारे जीवन में प्रभाव डालने वाली है। हमें किस ओर बढऩा चाहिए क्या हम गलत दिशा की ओर तो नहीं जा रहे हैं। ये सब कुछ नीति निर्णय करने के लिए अपने जीवन की प्लानिंग और उसे एक्ज्यूक्यूटिव करने के लिए जानना बहुत अधिक जरूरी है। यदि ईश्वर ने हमें कोई क्वालिटी देकर भेजी है तो क्या उसके साथ में बढऩा चाहिए या फिर समय के साथ में खुद की रफ्तार को मोड करते रहना चाहिए। अपनी एप्रोच को चेंज करते रहना चाहिए। मैंने कई युतियों के बारे में चर्चा की है। जैसे सूर्य और बुध का बुद्धादित्य योग, बुध और शुक्र का लक्ष्मी नारायण योग, मंगल और गुरु की युति। आज मैं ऐसे ही युति की बात करने जा रहा हूं जिससे जानना हम सभी के लिए बहुत अधिक आवश्यक है। ये है मंगल और शुक्र की युति। मंगल जो कि पराक्रम के कारक हैं, ग्रहों में सेनापति हैं, उत्तेजना देते हैं, ब्लड के फ्लो को नियंत्रित रखने का कार्य करते हैं वहीं शुक्र ऐश्वर्य के कारक, भोग के कारक, चकाचौंध के कारक हमेशा लाइम लाइट में रखने की कोशिश करवाते हैं व्यक्ति को शुक्र जैसे ग्रह। तो क्या मंगल और शुक्र की युतियां हमारे जीवन में शुभाशुभ प्रभाव देती है या फिर कठिनाइयां पैदा करती हैं। ये जानना अतिआवश्यक है। यहां एक भेद और है। एक तो हम इसे कहते हैं कि मंगल और शुक्र की युति और दूसरा शुक्र और मंगल की युति। आप कहेंगे कि दोनों ही बातें सेम है। मंगल और शुक्र की युति और शुक्र और मंगल की युति में डिफरेंस क्या है। यदि मंगल स्वक्षेत्री बैठे हुए हैं, उच्चस्थ बैठे हुए हैं और उनके साथ यदि भोग के कारक शुक्र आकर बैठ जाएं तो उसे हम कहेंगे मंगल और शुक्र की युति और यदि शुक्र स्ट्रांग पोजीशन में है, उच्चस्थ हैं, स्वक्षेत्री हैं, मित्र क्षेत्री हैं ऐसी ही स्थिति में यदि मंगल उनके साथ आकर बैठ जाएं तो उसे हम शुक्र और मंगल की युति के नाम से जानते हैं। अब जहां मंगल और शुक्र की युति बनती है वहां व्यक्ति में स्टेमना बहुत अधिक होगा। वो कोई स्पोर्टस पर्सन की कुंडली हो सकती है। विशेषकर ये युति यदि पंचम स्थान में, लग्न से पांचवां जो पिफ्थ हाउस में बन रही है, कर्म स्थान यानि जो टेन्थ हाउस उसमें बन रही है, लाभ स्थान में बन रही है तो स्टेमना व्यक्ति को बहुत अधिक देगी और ऐसे ही कार्य में उसे इंडलज रखेगी और जहां स्टेमना और मेहनत की आवश्यकता हो, जोश की आवश्यकता हो। अब जब व्यक्ति एक स्तर पर पहुंचने लगता है। मान लीजिये स्पोर्टस पर्सन है और वो एक स्तर पर पहुंचने लगा, उसके बाद उसे लाइम लाइफ बचाने की क्षमता देते हैं शुक्र। इस तरह ऐसे व्यक्ति के लिए ये युति बहुत ही अच्छी कही जा सकती है। अब रही बात शुक्र और मंगल की युति की। दशम स्थान, जो कि कर्म स्थान है, यदि शुक्र वहां स्ट्रांग पोजीशन में बैठे हुए हैं तो ऐसा व्यक्ति सिनेमेटोग्राफर, डायरेक्टर हो सकता है, एक्टर या एक्ट्रेस हो सकता है, जहां पर वो हमेशा चकाचौंध में बना रहता है। अब वहां यदि मंगल साथ में आ जाए तो व्यक्ति को उन्माद देने का कार्य करते हैं। मान लीजिये एक व्यक्ति सिंगर है, बहुत ही अच्छे से गाता है, उसके स्टेज परफोर्मेंस की जब बारी आई, वो स्टेज पर चढ़ा और जनता में उन्माद पैदा करने की जरूरत है तो शुक्र ने उसे एक कला तो दी, लेकिन मंगल ने साथ बैठकर उसे उन्माद देने का कार्य किया। तो जब ऐसी स्थिति बन गई तो वो व्यक्ति निश्चित रूप से सफलता के एक स्तर को अपने जीवन में प्राप्त करता है। अब यदि ये युति लग्न स्थान में बन जाए तो लग्न स्थान में बनने की वजह से ऐसा व्यक्ति खुद की पर्सनलटी को डवलप करने की बहुत अधिक कोशिश करता है। खुद को हमेशा लाइम लाइफ में रखने की कोशिश करता है और इस तरह हमेशा सजा और संवरा रहता है कि जैसे उसे किसी बारात में ही जाना हो। ये स्थिति मंगल और शुक्र लग्न स्थान में बैठकर व्यक्ति को देते हैं। यदि द्वितीय स्थान में ये युति बन जाए, मंगल और शुक्र की तो जो वाणी का गुण भगवान ने उसे देकर भेजा है, ईश्वर प्रदत्त जो उसे वाणी का वाकपटुता का गुण देकर भेजा है वो उसे नष्ट करने का कार्य करता है। दूसरे लोगों को इन्फ्लूऐंस करके इसके साथ में कुटुम्बीजनों के साथ में भी उसकी टकराहट की संभावनाएं बनी रहती है। जब मैं पराक्रम स्थान पर इस युति की बात करता हूं तो ऐसे योग उत्तेजना के कारक साथ में बैठ जाएं और फोरमेटिव ऐज में यानि की युवावस्था में इनकी दशा आ जाए। मंगल और शुक्र की दशा आ जाए तो ऐसा व्यक्ति एकाग्रचित्त बिलकुल नहीं हो सकता। वैसे भी पराक्रम स्थान में बैठकर मंगल और शुक्र व्यक्ति को 25-30 सैकिंड 45 सैकिंड से ज्यादा किसी भी एक मनोस्थिति पर रुकने ही नहीं देते लगातार चित्त को चलायमान रखते हैं और उसे डिस्टर्ब रखते हैं। ऐसी स्थिति में मति का क्षय यानि की जो याददाश्त है उसमें कमी आना, पराक्रम का व्यर्थ हनन होना ये सारी की सारी स्थितियां बनती ही है। अब यदि पंचम स्थान में, सप्तम स्थान में, दशम स्थान में या फिर एकादश स्थान में ये युति बन रही है तो ऐसे व्यक्ति को छोटी उम्र में ही अफेयर्स देने का कार्य करती है। कई बार माता-पिता से डिस्टर्ब रहते हैं कि बच्चे का जब सर्वांगीण विकास होना था, उसके फोरमेटिव ऐज में आगे बढऩा था, जब वो लड़के या लड़कियों के संबंध के अंदर रहने लग गया वहां पर अफेयर्स वाली पोजीशन आ गई। यदि ये सप्तम में युति बन जाए तो अफेयर्स कन्वर्ट करवाने का कार्य भी करती है। पंचम सप्तम का जो एक्सचेंज हो जाए या फिर मंगल और शुक्र का किसी भी भाव से एक्सचेंज हो जाए तो अफेयर को मैरीज में कन्वर्ट करवाने का कार्य करती है। यदि सप्तम में ये युति बन गई उसने अफेयर कन्वर्ट भी करवा दिया तो उसके बाद में भी उस व्यक्ति की इतर नारियों में आशक्ति रहती ही रहती है। या फिर पोस्ट मेरिटल एक्स्ट्रा अफेयर की तरफ ऐसा व्यक्ति जाता है। लाभ स्थान में भी ये युति इसी तरह के घटनाक्रम को दोहराने का कार्य करती है इससे हमें संभलने की आवश्यकता होती है। अब ये युति यदि सिक्स्थ हाउस, रोग स्थान में बन गई है, ऐसा व्यक्ति दांतों की तकलीफ से जूझता है और इसके साथ में मंगल जब षष्ठ स्थान में आ जाए तो व्यक्ति को ऋणी बनाते हैं। किसी न किसी कारण से रेडिव बनाते हैं और शुक्र जब साथ में आकर बैठ गया तो आप देखिये कि वो व्यक्ति अपने भोगविलास के लिए ही लगातार ऋण लेता है और अपनी जो जीवन की गाड़ी है उसे पटरी से उतारने का कार्य करता है। ट्रेवल्थ हाउस में, जो कि व्यय स्थान है, वहां पर यदि ये युति बन गई तो व्यक्ति शैय्या सुख की ओर बहुत अधिक लालायित रहता है। नयाशय की ओर नहीं बढ़ पाता। हमेशा इसी उत्तेजना की तरफ इंडलजस होती है। यदि नवम स्थान में ये युति बन जाए, नाइन्थ हाउस जो कि भाग्य और आध्यात्म का स्थान है, एक उम्र के बाद, भोग पूरे कर लेने के बाद में नेरास्य वाली स्थितियां आती है और व्यक्ति फोकस्ड और कंट्रोल एप्रोच के साथ में अपने जीवन को आगे बढ़ा पाता है। तो ये रही मंगल और शुक्र की युतियों के बारे में बात। यदि इसकी दशा आ जाए तो हमें बहुत अधिक सावधानी रखने की आवश्यकता रहती है। अब जब मंगल और शुक्र की युति बन रही हो और आप अपने जीवन में यदि आप अपनी कुंडली के माध्यम से मंगल और शुक्र की युति बनते हुए देख रहे हैं और ऐसे डिस्टरबेंसेस आपने महसूस किए हैं तो इस समय आपको गुरु को पावर देने की बहुत अधिक आवश्यकता होती है। आप कहेंगे कि ये क्या फार्मूला है। यदि मंगल और शुक्र युति कर रहे हैं तो गुरु को पॉवर देने की कहां आवश्यकता है। गुरु जो कि आत्म ज्ञान के कारक हैं, इसके साथ में हमारे जीवन में संयम के कारक हैं, यदि उन्हें और अधिक पॉवर दिया जाए, या फिर मंगल और शुक्र की युति हो और गुरु उन्हें देख रहे हों तो काफी हद तक स्थितियां कंट्रोल में रहती है और यदि ऐसा नहीं हो तो फिर आपको गुरु को पॉवर देना चाहिए। गुरु को पॉवर देने की वजह से मंगल और शुक्र के प्रभाव कम होने लगते हैं। व्यक्ति संयमित जीवन बिताता है और ये जो घटनाक्रम उजागर होते रहते हैं जीवन में ये भी कंट्रोल एप्रोच में आते हैं। यानि कि होते तो हैं, लेकिन दबे हुए रहते हैं। नवरात्रों में, गुप्त नवरात्रों में, देवी की उपासना मातृका की उपासना क्योंकि शुक्र दैत्य गुरु हैं और ये कंट्रोल में आते हैं देवी की उपासना से ही। तो ऐसी स्थिति में भोग और विलासिता की स्थितियां कम होती है। व्यक्ति अपने काम पे फोकस कर पाता है। अपनी ऊर्जा को पोजीटिविटि के साथ में आगे बढ़ा पाता है। तो आपको देवी की उपासना भी करनी चाहिए। याद रखिये, गुरु को जो है पॉवर दीजिये, इसके साथ में देवी की उपासना कीजिये तो ये जो मंगल और शुक्र की युति बनी है, ये अपने दुष्प्रभावों को कम करके शुभ प्रभावों की तरफ लेकर जाती है। तो ये थी मंगल और शुक्र की युति के बारे में चर्चा। आप भी अपने कुंडली खंगालिये। ये युति मंगल और शुक्र के रूप में कार्य कर रही है, या फिर शुक्र और मंगल की युति के रूप में कार्य कर रही है। ये देखिये और फिर अपने भावी जीवन को उसी अनुसार बनाना शुरू कीजिये।
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