एक होता है भय और दूसरा होता है भय का भय। जी हां, भय का भय सुनने में जरूर अटपटा लग सकता है, लेकिन हकीकत ये है कि इसी भय के भय से कमोबेश हर शख्स रूबरू होता-सा प्रतीत होता है। तो आइये, एक कहानी बताता हूं, जिससे ऊपरी बात का स्पष्टीकरण परखा जा सकता है।
एक हॉस्टल में 13-14 का बालक अध्ययनरत था। बालक सभी विषयों में पारंगत था, केवल एक विषय गणित में अपने आपको कमजोर महसूस करता था। और इसी कमजोरी को हॉस्टल में आने पर वहां के छात्रों ने उसे परवान पर चढ़ा दिया। छात्रों ने उससे कहा कि बाकी सब तो यहां ठीक है, लेकिन यहां की मैथेमेटिक, गणित, अन्य जगहों की तुलना में ज्यादा Hard है। अब तो उस बालक की चिंता सत्यता का जामा पहनती हुई प्रतीत होने लगी। वह दिन-रात इसी बारे में सोचता, कि मैं जिस विषय में कमजोर था, वही विषय यहां सबसे ज्यादा मुश्किल पैदा करने वाला साबित हो रहा है। कुछ दिनों की उधेड़बुन के बाद बालक ने निश्चय किया कि मैं गणित विषय के अध्यापक जी से इसका समाधान लेकर ही रहूंगा। बालक उनके कक्ष में गया और बोला, सर, मेरी गणित विषय को लेकर एक जिज्ञासा है, जिसे आप हल कर दें तो मेहरबानी होगी। अध्यापक ने कहा, बोलो क्या कहना चाहते हो। बालक ने कहा मैं गणित विषय में थोड़ा कमजोर महसूस करता हूं, यहां के छात्रों ने बताया कि इस हॉस्टल की गणित तो और भी Hard है, कृपया मुझे कोई ऐसा उपाय बतायें कि मैं इसको आसानी से हल कर सकूं, समझ सकूं। अध्यापक महोदय उसका प्रश्न सुनकर बोले, ठीक है, कल तुम सुबह खेल के मैदान पर मुझसे मिलना। बालक की उलझन बढ़ गई। वह समझ नहीं पा रहा था कि मैंने ठीक पूछा या नहीं, उत्तर भी नहीं मिला, दुबारा पूछ भी नहीं सकता। क्या करूं? लेकिन सिवाय उनकी बात मानने के कोई उपाय भी नहीं था। बालक दूसरे दिन नियत समय पर खेल मैदान में पहुंच गया। वहां पहले से अध्यापक उपस्थित थे। उन्होंने कहा, पास में जो पत्थर पड़ा है, उसे उठा लाओ, बालक ने वैसा ही किया। अब उससे कहा गया कि जो कबूतर दाना चुग रहे हैं, उनकी ओर इस पत्थर को उछाल दो। बालक ने Order का पालन किया। जैसे ही पत्थर फेंका सारे कबूतर उड़ गए। तब अध्यापक ने कहा, देखो, जिस पत्थर को तुमने फेंका वह पत्थर किसी भी कबूतर को लगा नहीं, फिर भी सारे कबूतर उड़ गए। क्यों? क्योंकि उनमें भय था। इसी भय की आशंका के कारण सारे कबूतर चले गए। मेरे कहने का मतलब है कि जिस समस्या को तुमने देखा ही नहीं, सिर्फ सुनी सुनाई बात के आधार पर अपनेे मन में बिठा लिया कि गणित कमजोर है, यहां Hard है, तो तुम्हारा भय और मजबूत होता गया और इसीके कारण तुमने बिना प्रश्न हल किए ही मान लिया कि गणित मुश्किल विषय है। समस्या का समाधान तब तक नहीं हो सकता है जब तक कि तुम उससे खुद अनुभव नहीं ले लेते। बालक के मन पर अध्यापक की बात का असर पड़ा और वह भय से रूबरू होने के लिए तत्पर दिखाई दिया। ये तो एक बात है, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति जीवन में कहीं-न-कहीं ऐसी ही निराधार बातों को सुनकर उनके प्रति अपनी राय कायम कर लेता है, भय को स्थान देने लगता है। सुनी-सुनाई बातों से जीवन में कई बार कटुता की स्थितियां उत्पन्न हो जाती है, इसलिए जीवन में सकारात्मकता को स्थान दीजिये, किसी भी बात को तभी स्थान दें जब वह बात खुद के अनुभव से गुजर चुकी हो।
एक छोटी-सी कहानी याद आई, शायद आपने भी कहीं सुनी होगी। एक गांव में एक नौजवान बड़ा ही निडर स्वभाव का रहता था। उस गांव में चर्चा फैल गई कि चौक के पेड़ पर रात को भूत आते हैं, इसलिए वहां से कोई न आया-जाया करे। उस नौजवान ने कहा, मैं जाता हूं, मुझे डर नहीं लगता। तो गांव वालों ने कहा कि हमें कैसे विश्वास हो कि तुम वहां गए थे, इसलिए हम गांव में रहेंगे तुम चौक में जाकर उस पेड़ पर एक कील को ठोककर आ जाना। हम सुबह देख लेंगे। नौजवान सहमत हो गया। वह रात को अंधेरे में उस पेड़ पर चढ़ता है और कील ठोककर जैसे ही उतरने लगता है कि उसकी धोती अटक जाती है, जो कि कील ठोकते समय अंधेरे के कारण कील के साथ ठोक दी गई थी, लेकिन उसे लगा कि भूत ने पकड़ लिया, और वह बेहोश हो गया। सुबह गांव वालों ने देखा कि नौजवान बेहोशी की हालत में है, तो मान लिया कि भूत है। जबकि हकीकत कुछ और ही थी। इसे ही मारवाड़ी कहावत में कहते हैं भय नहीं भैसान मार देवे। यानि कि भय है नहीं, केवल भय का भय हो तो भी आदमी कमजोर हो जाता है।
सारगर्भित बात कही जाए तो जीवन में सुनी सुनाई बातों, अंधविश्वासों आदि से बचते हुए प्रत्येक समस्या का समाधान खुद के अनुभव से गुजारें, तभी आगे के जीवन की राह आसान हो सकती है।
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