
सिंह लग्न की कुंडली में, जो कि स्थिर लग्न है, में कौन होते हैं योगकारक ग्रह साथ ही कौन से भाव को बाधा पहुंचाते हैं। भाग्येश, कर्मेश कैसे फल देते हैं। गुरु और शनि की स्थितियां किस तरह फल लेकर आती है। हमें किस ओर बढऩा चाहिए। किन चीजों को टाले जिससे अच्छे फल आ सकते हैं इन सभी की चर्चा-विश्लेषण। इस राशि के जातक खुद के व्यक्तित्व को प्रखरता के साथ बढ़ाने वाले होते हैं। यदि भाग्य स्थान में सेनापति के घर में सूर्य विराजित हो जाए तो उच्चस्थ स्थितियों का निर्माण करेंगे। सिंह लग्न की कुंडली में उच्चस्थ बैठ जाए तो एक उम्र के बाद आध्यात्मिक चेतना की ओर अग्रसर करते हैं। उसकी फैलोशिपी और दर्शन प्रखरता के साथ नए कीर्तिमान बनाते हैं। तुला राशि में सूर्य विराजित हो जाए तो नीचस्थ स्थितियों का निर्माण करने वाले होते हैं। सूर्य यहां भाग्य स्थान के अंदर बैठ जाएं तो भाग्य को प्रखरता देने वाले होंगे। बाद में आध्यात्मिक क्षेत्र की ओर भी ले जाते हैं। मंगल द्वितीय केन्द्र के अधिपति हुए और तृतीय त्रिकोण के भी आधिपति हुए तब योगकारक स्थितियों का निर्माण करते हैं। किन्तु ऐसी स्थिर लग्न की कुंडली में नवम भाव ही बाधक आधिपति भी होता है। मंगल की दशा आई तो बाधा पहुंचाने वाली होती है। बुध की दशा के अंदर भाग्य कमजोर करेंगे। यानि परिणाम कम आएंगे। राजा के भाव में ही जाकर बैठ जाए, लग्न स्थान जहां से शरीर की संरचना को देखा जाता है, तो ऐसे व्यक्ति को प्रभावित करना मुश्किल होता है। वहीं चन्द्रमा ने भी बढिय़ा पोजीशन धारण की तो सोने में सुंगध की स्थिति बनती है।
चतुर्थ स्थान के अंदर चन्द्रमा हो तो नीचस्थ स्थितियों का निर्माण करेंगे जिससे राजनीतिक क्षेत्र में वरदहस्त नहीं प्रदान करते। सूर्य और मंगल की युति यदि भाग्य स्थान में बन गई, तृतीय त्रिकोण में बनी तो अच्छे परिणाम वाली होगी। बुध की राशि में बन गई तब भी अच्छे परिणाम देंगे। सूर्य यदि लाभ स्थान में है तो बुद्धादित्य का निर्माण या फिर दशम या द्वादश में होंगे। बुध सूर्य से दूरी वाली स्थिति में नहीं चलते। प्रखर चेतना बढ़ाएंगे। किन्तु मंगल बैठेंगे तो फलों में न्यूनता की संभावना रहती है। वैसे तो एकादश उच्चय स्थान है, वहां पापी ग्रह अच्छे रिजल्ट देते हैं, लेकिन मानसिक विचारों को हानि पहुंचाते हैं। जब बुध की राशि में बैठे तो उनके प्रभाव कम करेंगे। चौथी दृष्टि से मंगल वापिस बराबरी वाली स्थितियां प्रदान करते हैं। बुध यहां लाभेश भी है और लाभेश के साथ-साथ द्वितीयेश भी है। व्यापार में बदलाव की प्रक्रिया में बुध अपना रोल प्ले करते हैं। प्रबंधन की स्थितियों में बुध की स्थितियों को प्रखरता के साथ में देखना आवश्यक है। यहां लाभेश और द्वितीयेश हुए बुध। इस स्थिति में बढिय़ां स्थितियों में बैठ गए यदि द्वितीयेश होकर द्वितीय स्थान में बैठ गए तो वाणी में एक अलग तरह का पराक्रम देने का कार्य करते हैं। शुक्र कंठ के आधिपति हो जाए तो वोकल में व्यक्ति नामचीन होता है। एक तो बुध ने उच्च स्थितियां ली तो वाणी में मृदुभाषिता और हाजिरजवाबी देने का कार्य किया। बुध उच्चस्थ हो गए, शुक्र वोकल में पराक्रम में विराजित, सूर्य यहां साथ में बुध के विराजित इनकी चाल भी समानान्तर रहती है। जब यहां बुध और सूर्य जैसे ग्रह स्थापित हुए तो थोड़ा बहुत कुटुम्ब के साथ में व्यावहारिक हानि देने का कार्य करते हैं। लेकिन कंठ के अंदर शुक्र जैसे सौम्य ग्रह बैठ गए तो कंठ से उन्मुक्त जैसी स्थितियों का निर्माण किया साथ में जब बुध यहां बैठे तो मृदुभाषिता को बढ़ाएंगे। प्रखर वक्ता वाली स्थितियों में पहुंचा देते हैं। पंचम स्थान में गुरु बैठ जाए तो फिर कहना ही क्या। सूर्र्य कर्म स्थान में हो और बुध यहां विराजित हो और पंचम स्थान को देखते हों तब भी हाजिरजवाबी देने का कार्य करते हैं। ऐसा व्यक्ति वकालात, इलेक्ट्रानिक या मीडिया के क्षेत्र में भी अच्छी पोजीशन्स को फील करने वाला होता है।
सुख स्थान को सातवीं दृष्टि से देखते हैं तो सुखों के प्रति आसक्त नहीं रखते और कर्म के प्रति लगातार चलायमान रखते हैं। लाभ स्थान के आधपिति और द्वितीय स्थान लिक्विडिटि के आधिपति हुए इनकी स्थिति भी आसपास की स्थितियों में रह जाए तो अच्छे परिणाम देने वाले होंगे। गुरु यहां पर शिक्षा के कारकात्व लिए हुए भी होते हैं और शिक्षा भाव के आधिपति भी हो जाते हैं, गर्भ धारण के भी आधिपति हो जाते हैं इसके साथ में अष्टमेश हो जाते हैं तो पलड़ा एक तरह से बराबर हो गया। हिडन हाउस के आधिपति हो गए और पंचम स्थान के आधिपति भी हो गए। मंगल और शनि अच्छी पोजीशनिंग ले ले तो व्यक्ति खोजबीन के अंदर अपने जीवन को बिताने वाला होता है। कई बार गुरु की स्थिति अच्छी हो जाए तो एक अच्छा प्रखर ज्योतिषीय बनने की तरफ भी जा सकता है। पेट संबंधी समस्याएं और लीवर फंक्शनिंग को प्रोबलम देने वाली स्थितियों में गुरु अपना रोल प्ले करते हैं। क्योंकि हिडन हाउस है तो एक तरह से अच्छी पोजीशन में अंदर बैठ गए और उच्चस्थ स्थितियों का निर्माण करते हुए व्यय स्थान में बैठ गए तो बड़ा ही अच्छा। मितव्ययी बनाएंगे। सुख स्थान को देखेंगे तो वहां भी वृद्धि करने वाले होंगे। इसके साथ शनि के हाउस को देखेंगे तो कर्ज में संचालित करके आगे बढ़ाते जाएंगे। नौवीं दृष्टि से इस हाउस के खुद के ही भाव को देखेंगे तो यहां पर भी वृद्धि करेंगे। लम्बी उम्र की तरफ गुरु उच्चस्थ स्थितियों में बैठकर ले जाते हैं। जहां षष्टेश हुए वहीं सप्तमेश भी हुए तो ये स्थितियां निर्भर करने वाली होती है।
सप्तमेश होकर भले ही उच्चस्थ स्थितियों में पराक्रम स्थान के अंदर बैठ जाए, दूसरे फील्ड में तो व्यक्ति अपने नाम को स्थापित करता है किन्तु गृहस्थ के भाव में बैठकर विच्छोह तक देने का कार्य करते हैं। बुद्धि में न्यूनता देने का कार्य करते हैं। यहां षष्टेश होकर जो कर्ज वाली स्थिति रही इसके साथ-साथ शत्रु पनपने की संभावनाएं होती है, व्यर्थ के विवादों के साथ में वो भी खड़ी होती चली जाती है उस स्थिति का भी ध्यान रखना चाहिए। नीचस्थ स्थितियों में बैठ जाए या भाग्य स्थान में बैठ जाए, मंगल की राशि में बैठ जाए तो भाग्य स्थान में सप्तमेश हुए तो ऐसे व्यक्ति का भाग्योदय वो विवाह के पश्चात संभावनाएं रहती है, लेकिन उसमें प्रबलता की स्थिति नहीं रहती क्योंकि शनि नीचस्थ स्थितियों के अंदर विराजित हो गए हैं। साथ में षष्टेश भी हैं तो ध्यान रखकर संभल कर आगे बढऩा चाहिए। राहू और केतु भी महत्व के रोल प्ले करते हैं। ऐसे विच्छेदीकारक ग्रह द्वितीय हाउस में बैठ जाए तब भी स्थिति अच्छी नहीं क्योंकि परिवार से विच्छोह देते हैं। चतुर्थ स्थान में मंगल की राशि में केतु अकेले आकर बैठ जाए और जब इनकी दशा आए तो अपने फलाफल में एक अलग तरीका का प्रतिबिम्बि लेकर आते हैं, किन्तु उसमें नष्टता रहती ही है। षष्ट, अष्टम या द्वादश में बैठ जाए तो यहां बैठकर मोक्षकारक स्थितियों का निर्माण करते हैं। पंचम में, जहां उच्चस्थ मूलक माना गया है, बैठ जाए तो मिसकैरेज की स्थितियों के साथ में महिला को गुजरना पड़ता है यदि पंचम में केतु विराजित हो जाए। भले ही उच्चस्थ का निर्माण करे। शिक्षा में भी व्यर्थ के ब्रेक। लगातार अच्छी शिक्षा चलती रहे तो भी ऐन समय बीमारी आदि से रुकावट की संभावना, ध्यान रखना चाहिए।
राहू यहां बैठ जाए तो एक तो लाभ स्थान, पुण्य फलों का उदय वाला स्थान साथ में नकारात्मक रूप से आंतरिक चेतना प्रभावित करने वाले ग्रह अगर ड्रेगनटेल्स ये स्थिति ले लेंगे तो पुण्य फलों का उदय करने वाले होंगे। लेकिन साथ-साथ जुबान के साथ में खुराफात देने का कार्य भी करेंगे। भले ही बुध अच्छी स्थिति में बैठे हों। सौ अच्छे काम करके कई बार व्यक्ति अपनी वाणी से बिगाड़ करने का कार्य करता है। यहां गुरु पंचमेश होकर, दशम स्थान शुक्र की राशि स्थान में बैठ जाए तो ऐसा व्यक्ति फैशन टेक्नोलाजी और डिजाइनिंग के फील्ड के इंस्टीट्यूट में बड़ी अच्छी स्थिति को पाने वाला होता है। इस कुंडली में भाग्येश की दशा सीमित वाली होती है। परिणाम तो देंगे क्योंकि चतुर्थेश है मंगल साथ में नवमेश भी है तब भी थोड़ी सी न्यूनता व्यक्ति को देंगे। लग्नेश की दशा, सूर्य की दशा जब भी आती है प्रखर तेजवान, दीप्ति पुंज की दशा आती है तो भगाने-दौड़ाने का काम करती है। क्योंकि सूर्य तपाते भी हैं। सूर्य शानदार स्थिति में बैठ जाए तो लग्नेश की दशा व्यक्ति के पूरे जीवन को बदलकर रख देती है। ये स्थिति आने वाली हो तो ध्यान रखियेगा। गृहस्थ के हिसाब से शनि की स्थितियों का ध्यान रखने की आवश्यकता रहती है। शनि यदि गलत स्थिति लिए हुए हो तो उपायजनित व्यवस्थाओं के साथ में आगे बढऩा चाहिए। सप्तम स्थान में शनि बैठ जाए मूल त्रिकोण राशि में बैठ जाए और लग्न स्थान को देखने वाले हों तब भी दिक्कत देने का कार्य करते हैं। ईगो से बचना चाहिए। वैसे शनि के अंत के परिणाम अच्छे होते हैं। शनि ने फंसाने का कार्य किया वहां संभल जाएं, आत्ममंथन के साथ बढ़े तो अंत के समय में अच्छी स्थिति निकलकर आती है। यदि द्वितीय और द्वादश का एक्सचेंज होता हो तो ठीक है किन्तु यदि नवमेश यहां द्वादश हाउस में बैठ जाए तो उस स्थिति को अच्छा नहीं कहा जा सकता। उपायों के साथ आगे बढऩा चाहिए।
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