आज की भागदौड़ भरी जिन्दगी में मनुष्य भौतिकता की चकाचौंध में इतना निमग्न है कि शरीर में पनपने वाले रोगों की ओर ध्यान ही नहीं दे पाता। रोग क्या है? इसे सरल भाषा में कहूं तो यह सिर्फ मस्तिष्क-मन-शरीर इन तीनों में असन्तुलन ही रोग है व सन्तुलन ही स्वास्थ्य है। स्वास्थ्य को अगर सही अर्थ में समझे तो स्व में स्थित होना ही पूर्ण स्वास्थ्य है। पंचकोश विवेक के अनुसार हमारे मनोमय कोष में असन्तुलन जब होता है तो मस्तिष्क में तनाव उत्पन्न हो, हमारे शारीरिक स्तर पर रोग उत्पन्न हो जाते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा की दृष्टि से देखें तो रोग का मुख्य कारण शरीर में विजातीय द्रव्यों का संचय होना है। ऋषि-मुनियों की परम्परा योग प्राकृतिक चिकित्सा के आधार को विश्व विज्ञान भी मानने लगा है। विज्ञान के अनुसार 95 प्रतिशत बीमारियां शरीर में हो रहे असंतुलन को न पहचान पाना रोगों का मुख्य कारण है।
प्रदूषित व तनाव युक्त जीवन शैली में रोग मुक्त जीवन जीने के लिए हमें दैनिक जीवन में योग को अपनाना होगा अन्तमय कोष अर्थात शारीरिक स्तर पर स्वस्थ होने के लिए हमें प्राकृतिक चिकित्सा का सहारा लेते हुए आन्तरिक शुद्धिकरण करना होगा, शरीर से गन्दगी विजातीय द्रव्य निकालने के 13 मार्ग हैं मुख्य चार मार्ग हैं- नाक से प्रश्वास, चमड़ी से पसीने के रूप में, मल निष्कासन व मूत्र विसर्जन के द्वारा आन्तरिक शुद्धिकरण होता है और इन रास्तों के कम काम करने से विजातीय द्रव्य जमा होकर रोग के रूप में उभर कर आते हैं। अर्थात रोगोंं से बचने व लडऩे के लिए योग को अपनाते हुए सम्पूर्ण स्वास्थ्य हर कोश को स्वस्थ बनाना होगा। प्रारम्भिक स्तर पर शरीर-मन-मस्तिष्क का आपसी जोड़ ही योग है। आज के दूषित वातावरण एवं जीवन के निरन्तर बढ़ते संघर्ष में मानव अपने स्वयं के प्रति इतना उदासीन हो गया है कि उसके लिए सामान्य जीवन जीना भी एक गंभीर समस्या बन गई है।
आहार निद्रा भयं मैथुन च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम्।
बुद्धिर्हि तेषामधिको विशेषो बुद्धिर्विहीना: पशुभि: समाना:।।
स्वास्थ्य प्राप्ति के क्षेत्र में आज अनेक चिकित्सा पद्धतियां हमारे सामने हैं जो कि उपचार में लाभ की जगह असमंजस ही बढ़ाती हैं। ठीक उसी प्रकार योग विद्या हमारे वेदों व उपनिषदों से निकली हुई हैं। तैत्तरीय उपनिषद में योग की विस्तारपूर्वक व्याख्या की गई जिसमें पंचकोष विवेक के आधार पर शरीर को देखा है। प्रत्येक कोश के शरीर में अपने अलग-अलग कार्य तथा उन कार्यो के अपने क्षेत्र हैं। हमारी योगिक पद्धति ऐसी होनी चाहिए जिसमें कि हम प्रत्येक कोश को अधिक सुदृढ़ व स्वस्थ बना सकें तथा सम्पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त कर सकें। आज उपनिषदों व वेदों की स्वास्थ्य के प्रति इस अवधारणा को विश्व स्वास्थ्य संगठन भी मानने लगा है। शरीर और मन से स्वस्थ बने रहने तथा स्वास्थ्य प्राप्ति के लिए 'आसनÓ जिनका अभ्यास योग में किया जाता है बहुत उपयोगी हैं। योग की वेदोंं, उपनिषदोंं व कई ग्रन्थों में व्याख्या की गई है। सीधे अर्थो में योग का कार्य शरीर, मन, प्राण, बुद्धि और अध्यात्म इन सभी स्तरों पर व्यक्ति का सम्पूर्ण विकास करना है। इस प्रकार योग व्यक्ति के सर्वतोमुखी विकास की एक समग्र प्रक्रिया है-
1. मांसपेशियोंं के स्तर पर पूरी तरह तनाव मुक्त स्थिति।
2. प्राणिक स्तर पर धीमा, मंथर व संतुलित श्वास-प्रश्वास।
3. मानसिक स्तर पर सृजन व संकल्प शक्ति का विकास।
4. बौद्धिक स्तर पर बुद्धि की प्रखरता व मन की शांति।
5. भावनात्मक स्तर पर योग जीवन के हर रूप में मनुष्य के भीतर निहित दिव्यता का प्रकाशन करता है।
'यमनियमासन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाध्योष्टसावङ नि।।
1. यम-आत्म संयम की वह साधना जिसमें स्वयं के लिए निषेध है।
2. नियम- वे आदेश जो प्रकृति प्रदत्त शुद्धिकरण दें।
3. आसन- शरीर की स्थिर व सुख प्राप्ति वाली मुद्राएं।
4. प्राणायाम-श्वास पर नियंत्रण व प्राण शक्ति का विस्तार।
5. प्रत्याहार-इन्द्रियों का उनके विषय से निग्रह।
6. धारणा-मन का केन्द्रीकरण।
7. ध्यान-विकेन्द्रीकरण।
8. समाधि-चरम चैतन्य अवस्था।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि योग व्यक्ति के तन और मन के विकारों का नाशकर उन्हें स्वस्थ, सुन्दर और स्वच्छ बनाता है लेकिन आवश्यकता आपसी सामंजस्य की भी है। हमें योग के साथ-साथ आयुर्वेद व प्राचीन विधाओं को भी साथ में प्रयोग करने से लाभ अधिक होता है। अगर गौर से देखा जाए तो रोग का मुख्य कारण तनाव व जीवन में अविचलित दिनचर्या व आहार पर नियंत्रण नहीं होता है। कारण किसी भी रोग होने का इतने में से एक या अनेक कारण मिलकर शरीर में कष्ट आता है।
भागदौड़ भरी जिन्दगी में किंचित मात्र ही समय यम-नियमादि को दे पाए तो हो सकता है कि रोग पनप ही न पाए। यम-नियमादि अपनाने से जहां रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, वहीं मनुष्य की उन्नति में भी मददगार प्रतीत होती है। यह बात अब विज्ञान भी स्वीकारने लगा है।
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