5. वेद और योग
लगातार.......6
वेदों में योग का स्वरूप
वेद सर्व सत्य विद्याओं की पुस्तक है। मानवीय जीवन की समस्त समस्याओं का समाधान वेद में निबद्ध है। यह मान्यता सर्ववदित है। सब सत्य विद्याओं में प्रमुख रूपेण ब्रह्मविद्या आध्यात्मविद्या सर्वमत है। स्पष्ट है कि वेद का ब्रह्मविद्या अर्थात योग-विद्या से घनिष्ठ सम्बन्ध हैै।
वैदिक संहिताओं का अध्ययन करने से उनका स्वरूप यज्ञमय अथवा स्तुतिमय प्रतीत होता है। परन्तु ऋग्वेद मन्त्र केवल यज्ञमय अथवा स्तुतिमय न होकर अपितु यज्ञार्थक होने के साथ उनके अन्तरतम में योग के बीज विद्यमान हैै। विज्ञान-भिक्षु ने भी स्वीकार किया है कि सभी वेदों के अर्थ का सार ही व्यास के भाष्य में है-
''सर्ववेदार्थ सारोऽत्र वेद व्यासेन भाषित:।
योग भाष्यभिषेणातों मुमुक्ष्णमिद गर्त।।3
व्यास भाष्य में योग-विद्या को ही स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है, उसमें विवेचित विषय को यहाँ वेदार्थ के सार रूप में स्वीकार किया गया है, अत: यह तथ्य पूर्णरूपेण प्रमाणित है कि वेदों में निहित गूढ़ अर्थ का प्रतिपादन योग शास्त्रों में है।
वस्तुत: वेदों में सत्य एवं तप आदि के अनुष्ठान के फलस्वरूप विशुद्ध सत्त्व सम्पन्न चित्त वाले ऋषित्व को प्राप्त हुए मुनियों के दिव्य चक्षु द्वारा साक्षात्कृत ब्रह्माण्ड के अनेक रहस्य सन्निहित है, जिन रहस्यों का साक्षात्कार यौगिक दृष्टि से सम्पन्न योगीगण सदैव करते रहते हैं।
वेदों में जो भी वर्णन मिलता है उनमें चेतन शक्ति के विविध स्तरों की व्याख्या अथवा आत्मसाक्षात्कार की विधि या आत्मसाक्षात्कार के लिए प्ररित करने वाले वचन है।
आदि देव शंकर के बाद वैदिक ऋषि-मुनियों से ही योग का प्रारम्भ माना जाता है।
यस्मादृते न सिध्यति यज्ञो विपश्चितश्चन। स धीनां योगमिन्वति।। (ऋक्संहिता, मंडल-1, सूक्त-18, मंत्र-7)
अर्थात- योग के बिना विद्वान का भी कोई यज्ञकर्म सिद्ध नहीं होता। वह योग क्या है? योग चित्तवृत्तियों का निरोध है, वह कर्तव्य कर्ममात्र में व्याप्त है।
स घा नो योग आभुवत् स राये स पुरं ध्याम। गमद् वाजेभिरा स न:।। (ऋग्वेद 1-5-3 )
अर्थात-वही परमात्मा हमारी समाधि के निमित्त अभिमुख हो, उसकी दया से समाधि, विवेक, ख्याति तथा ऋतम्भरा प्रज्ञा का हमें लाभ हो, अपितु वही परमात्मा अणिमा आदि सिद्धियों के सहित हमारी ओर आगमन करे।
उपनिषद में इसके पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं। कठोपनिषद में इसके लक्षण को बताया गया है-
तां योगमित्तिमन्यन्ते स्थिरोमिन्द्रिय धारणम्
योगाभ्यास का प्रामाणिक चित्रण लगभग 3000 ई.पू. सिन्धु घाटी की सभ्यता के समय की मोहरों और मूर्तियों में मिलता है। योग का प्रामाणिक ग्रंथ योगसूत्र 200 ई.पू. योग पर लिखा गया पहला सुव्यवस्थित ग्रंथ है। इन सबका मूल वेद और उपनिषद ही रहा है।
वैदिक काल में यज्ञ और योग का बहुत महत्व था। इसके लिए उन्होंने चार आश्रमों की व्यवस्था निर्मित की थी। ब्रह्मचर्य आश्रम में वेदों की शिक्षा के साथ ही शस्त्र और योग की शिक्षा भी दी जाती थी। इससे पूर्व वेदों को कंठस्थ कराकर हजारों वर्षों तक स्मृति के आधार पर संरक्षित रखा गया था। भारतीय दर्शन की मान्यता के अनुसार वेदों को अपौरुषेय माना गया है अर्थात वेद परमात्मा की वाणी हैं।
क्रमश:
Comments
Post a Comment