6. वेद और मनु स्मृति
लगातार........
मनु स्मृति के मंत्र
मनु स्मृति में भी आए मंत्रों से वेदों के सार का समावेश नजर आता है। हिन्दू धर्म के ग्रंथ शास्त्रों में वेदों का प्रभाव चारों ओर नजर आता है। सत्य एक ही होता है, उसके बखान के माध्यम अलग-अलग हो सकते हैं। मनु स्मृति में आए मंत्रों में भी सत्य की झलक स्पष्ट दृष्टिगोचर होती नजर आती है। जैसे-
एवं य: सर्वभूतेषु पश्यत्यात्मानं आत्मना। स सर्वसमतां एत्य ब्रह्माभ्येति परं पदम्।
इसी प्रकार समाधियोग से जो मनुष्य सब प्राणियों में परमेश्वर को देखता है वह सबको अपने आत्मा के समान प्रेमभाव से देखता है वही परमपद जो ब्रह्म-परमात्मा है उसको यथावत् प्राप्त होकर सदा आनन्द को प्राप्त होता है।
एष सर्वाणि भूतानि पञ्चभिर्व्याप्य मूर्तिभि:। जन्मवृद्धिक्षयैर्नित्यं संसारयति चक्रवत्।
यह परमात्मा पञ्च-महाभूतों से सब प्राणियों को युक्त करके अर्थात् उनकी उत्पत्ति करके उत्पत्ति, वृद्धि और विनाश करते हुए सदा चक्र की तरह संसार को चलाता रहता है।
एतं एके वदन्त्यग्निं मनुं अन्ये प्रजापतिम्। इन्द्रं एके परे प्राणं अपरे ब्रह्म शाश्वतम्।
इस परमात्मा (12/122) को कोई अग्नि, कोई प्रजापति परमात्मा को मनु कोई इन्द्र, कोई प्राण, दूसरे कोई शाश्वत ब्रह्म कहते हैं । स्वप्रकाश होने से अग्नि, विज्ञानस्वरूप होने से मनु, सबका पालन करने और परमैश्वर्यवान होने से इन्द्र, सबका जीवनभूत होने से प्राण और निरन्तर व्यापक होने से परमेश्वर का नाम ब्रह्म है।
प्रशासितारं सर्वेषां अणीयांसं अणोरपि। रुक्माभं स्वप्नधीगम्यं विद्यात्तं पुरुषं परम्।
जो सबको शिक्षा देने वाला, सूक्ष्म से सूक्ष्म, स्वप्रकाश स्वरूप, समाधिस्थ बुद्धि से जानने योग्य है, उसको परम पुरुष जानना चाहिए।
आत्मैव देवता: सर्वा: सर्वं आत्मन्यवस्थितम्। आत्मा हि जनयत्येषां कर्मयोगं शरीरिणाम्।
आत्मा अर्थात् परमेश्वर ही सब व्यवहार के पूर्वोक्त देवताओं को रचने वाला, और जिसमें सब जगत स्थित है, वही सब मनुष्यों का उपास्य देव तथा सब जीवों को पाप-पुण्य के फलों का देने वाला है।
सर्वं आत्मनि संपश्येत्सच्चासच्च समाहित:। सर्वं ह्यात्मनि संपश्यन्नाधर्मे कुरुते मन:।
जो सावधान पुरुष असत्कारण और सत्कार्यरूप जगत् को आत्मा अर्थात् सर्वव्यापक परमेश्वर में देखे, वह कभी अपने मन को अधर्मयुक्त नहीं कर सकता, क्योंकि वह परमेश्वर को सर्वज्ञ जानता है।
एतद्वोऽभिहितं सर्वं नि:श्रेयसकरं परम्। अस्मादप्रच्युतो विप्र: प्राप्नोति परमां गतिम्।
यह (12/83-115) मोक्ष देने वाले सर्वोत्तम कर्मों का विधान तुम ने कहा, विद्वान् द्विज इसको बिना छोड़े पालन करता हुआ उत्तम गति अर्थात् मुक्ति को प्राप्त कर लेता है।
यं वदन्ति तमोभूता मूर्खा धर्मं अतद्विद:। तत्पापं शतधा भूत्वा तद्वक्तॄननुगच्छति।
जो अविद्यायुक्त, मूर्ख, वेदों के न जानने वाले मनुष्य जिस धर्म को कहें, उसको कभी न मानना चाहिए, क्योंकि जो मूर्खों से कहे हुए धर्म के अनुसार चलते हैं उनके पीछे सैकड़ो प्रकार के पाप लग जाते है।
अव्रतानां अमन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम्। सहस्रश: समेतानां परिषत्त्वं न विद्यते।
ब्रह्मचर्य, सत्यभाषण आदि व्रत वेदविद्या वा विचार से रहित जन्ममात्र से शूद्रवत् वर्तमान है, उन सहस्रों मनुष्यों के मिलने से भी सभा नहीं कहाती।
एकोऽपि वेदविद्धर्मं यं व्यवस्येद्द्विजोत्तम:। स विज्ञेय: परो धर्मो नाज्ञानां उदितोऽयुतै:।
यदि एक अकेला सब वेदों का जानने वाला द्विजों में उत्तम संन्यासी जिस धर्म की व्यवस्था करे वही श्रेष्ठ धर्म है, अज्ञानियों के सहस्रों, लाखों, करोड़ो मिल कर जो कुछ व्यवस्था करे, उसको कभी न मानना चाहिए।
ऋग्वेदविद्यजुर्विच्च सामवेदविदेव च । त्र्यवरा परिषज्ज्ञेया धर्मसंशयनिर्णये ।
तथा ऋग्वेदवित्, यजुर्वेदवित् और सामवेदवित् इन तीनों विद्वानों की भी सभा धर्मसंशय अर्थात् सब व्यवहारों के निर्णय के लिए होनी चाहिए। और जिस सभा में ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के जानने वाले तीन सभासद हो कर व्यवस्था करें, उस सभा की की हुई व्यवस्था का भी कोई उल्लंघन न करे।
क्रमश:
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