धर्मग्रंथों की मान्यता के अनुसार पीपल के वृक्ष में स्वयं श्री नारायण हरि का वास माना गया है। पीपल वृक्ष की पूजा का विधान तो कई शास्त्रों में अलग-अलग स्वरूपों में करने का प्रावधान मिलता है, लेकिन शनि की साढ़े साती या ढैय्या या शनि दृष्टि से अमंगल की स्थिति में भी पीपल की पूजा कार्य सिद्धी वाली मानी गई है। क्योंकि ब्रह्म पुराण के 118 वें अध्याय में शनिदेव कहते हैं- 'मेरे दिन अर्थात शनिवार को जो मनुष्य नियमित रूप से पीपल के वृक्ष का स्पर्श करेंगे, उनके सब कार्य सिद्ध होंगे तथा मुझसे उनको कोई पीड़ा नहीं होगी। जो शनिवार को प्रात:काल उठकर पीपल के वृक्ष का स्पर्श करेंगे, उन्हें ग्रहजन्य पीड़ा नहीं होगी। शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष का दोनों हाथों से स्पर्श करते हुए 'ऊँ नम: शिवाय का 108 बार जाप करने से दु:ख, कठिनाई एवं ग्रहदोषों का प्रभाव शांत हो जाता है। हर शनिवार को पीपल की जड़ में जल चढ़ाने और दीपक जलाने से अनेक प्रकार के कष्टों का निवारण होता है। नौकरी, व्यवसाय में सफलता, आर्थिक समृद्धि एवं कर्ज मुक्ति हेतु शनिवार के दिन पीपल में दूध, गुड़, पानी मिलाकर चढ़ायें एवं प्रार्थना करें-'हे प्रभु! आपने गीता में कहा है कि वृक्षों में पीपल मैं हूँ। हे भगवान! आप कृपा करके मेरी यह परेशानी-दु:ख दूर करने की कृपा करें। पीपल का स्पर्श करें व प्रदक्षिणा करें।
पद्मपुराण के अनुसार पीपल का वृक्ष भगवान विष्णु का रुप है। इसलिए इसे धार्मिक क्षेत्र में श्रेष्ठ देव वृक्ष की पदवी मिली और इसका विधि विधान से पूजन आरंभ हुआ। हिन्दू धर्म में अनेक अवसरों पर पीपल की पूजा करने का विधान है। मान्यता है कि सोमवती अमावस्या के दिन पीपल के वृक्ष में साक्षात भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी का वास होता है। पुराणों में पीपल का बहुत महत्व बताया गया है-स्कंदपुराण
मूल विष्णु: स्थितो नित्यं स्कन्धे केशव एव च। नारायणस्तु शाखासु पत्रेषु भगवान हरि:।
फलेस्च्युतो न सन्देह: सर्वदेवे: समन्वित:। स एव विष्णुर्द्रुम एव मूर्तो महात्मभि: सेवतिपुण्यमूल:।
यस्याश्रय: पापसहस्त्रहन्ता भवेन्नृणां कामदुधो गुणाढ्य:।
इसका अर्थ है कि पीपल की जड़ में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में भगवान हरि और फलों में सब देवताओं से युक्त अच्युत सदा निवास करते हैं। यह वृक्ष मूर्तिमान श्रीविष्णु स्वरूप है। महात्मा पुरुष इस वृक्ष के पुण्यमय मूल की सेवा करते हैं। इसका गुणों से युक्त और कामनादायक आश्रय मनुष्यों के हजारों पापों का नाश करने वाला है। पद्मपुराण के अनुसार पीपल को प्रणाम करने और उसकी परिक्रमा करने से आयु लंबी होती है। जो व्यक्ति इस वृक्ष को पानी देता है, वह सभी पापों से छुटकारा पाकर स्वर्ग को जाता है। पीपल में पितरों का वास माना गया है। इस प्रकार जल चढ़ाने से पितृ दोष बाधा निवारण में भी सहायक होता है।
प्रत्येक शनिवार को पीपल के वृक्ष पर जल, कच्चा दूध थोड़ा चढ़ाकर, सात परिक्रमा करके सूर्य, शंकर, पीपल- इन तीनों की सविधि पूजा करें तथा चढ़े जल को नेत्रों में लगाएं और पितृ देवाय नम: भी 4 बार बोलें तो राहु+केतु, शनि+पितृ दोष का निवारण होता है.
प्रसन्न होते हैं बृहस्पति
पीपल के वृक्ष के कई ज्योतिषीय गुण बोध माने गए हैं। पीपल को बृहस्पति ग्रह से जोड़ा जाता है। माना जाता है कि पीपल का बृहस्पति से सीधा संबंध होता है। बृहस्पति को सभी ग्रहों में सबसे अधिक लाभ देने वाला ग्रह माना जाता है। बृहस्पति धन का कारक ग्रह है। बृहस्पति जब भी किसी की कुंडली में प्रवेश करते हैं, उस व्यक्ति को पीपल की जड़ में जल चढ़ाने को कहा जाता है। माना जाता है कि पीपल में जल चढ़ाने से कुंडली में मौजूद कमजोर बृहस्पति मजबूत होता है और मजबूत बृहस्पति समृद्ध।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पीपल का पेड़ यथासंभव इसके स्थान से हटाया या काटा नहीं जाना चाहिए. पीपल की पूजा से कार्यों और विचारों में स्थिरता आती है, मन का भटकाव रूकता है। पीपल की पूजा से व्यक्ति की तार्किक क्षमता में वृद्धि होती है। पीपल की पूजा से विवाह में आ रही बाधाओं का निवारण होता है और विवाह शीघ्र संपन्न होता है। पीपल का आशीर्वाद संतान जन्म को सरल, संभव बनाकर वंश वृद्धि में सहायता होता है। पीपल की पूजा से व्यक्ति में दान-धर्म की प्रवृत्ति बढ़ती है। पीपल की पूजा से आय का प्रवाह आसान बनता है तथा व्यक्ति की बुद्धिमत्ता बढ़ती है और उसे दीर्घायु बनाती है।
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