कल्पवास और कुंभ
कल्पवास की परम्परा का निर्वाह कुंभ के समय ही किया जाता है। कल्पवास करके मनुष्य आध्यात्मिक विकास की बुलंदियां छू सकता है। प्रयागराज में गंगा-यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम स्थल पर कल्पवास की परंपरा आदिकाल से चली आ रही है। तीर्थराज प्रयाग में संगम के निकट हिन्दू माघ महीने में कल्पवास करते हैं। मान्यता है कि प्रयाग में सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के साथ शुरू होने वाले एक मास के कल्पवास से एक कल्प अर्थात ब्रह्मा के एक दिन का पुण्य मिलता है। पौष पूर्णिमा से कल्पवास आरंभ होता है और माघी पूर्णिमा के साथ संपन्न होता है।
कल्पवास में लोग संगम के तट पर डेरा जमाते हैं। पौष पूर्णिमा के साथ आरंभ करने वाले श्रद्धालु एक महीने वहीं बस जाते हैं और भजन-ध्यान आदि करते हैं। कुछ लोग मकर संक्रांति से भी कल्पवास आरंभ करते हैं। कल्पवास मनुष्य के लिए आध्यात्मिक विकास का जरिया है।
कुम्भ मेले में संगम तट पर कल्पवास का खास महत्व है। कल्पवास का जिक्र वेदों और पुराणों में भी मिलता है। कल्पवास एक बहुत ही मुश्किल साधना है क्योंकि इसमें तमाम तरह के नियंत्रण और संयम का अभ्यस्त होने की जरूरत होती है। पद्म पुराण में महर्षि दत्तात्रेय ने कल्पवास के नियमों के बारे में विस्तार से बताया है। उनके अनुसार कल्पवासी को इक्कीस नियमों का पालन करना चाहिए। ये नियम हैं-सत्यवचन, अहिंसा, इन्द्रियों का शमन, सभी प्राणियों पर दयाभाव, ब्रह्मचर्य का पालन, व्यसनों का त्याग, सूर्योदय से पूर्व शैय्या-त्याग, नित्य तीन बार सुरसरि-स्नान, त्रिकालसंध्या, पितरों का पिण्डदान, दान, जप, सत्संग, क्षेत्र संन्यास अर्थात संकल्पित क्षेत्र के बाहर न जाना, परनिन्दा त्याग, साधु सन्यासियों की सेवा, जप एवं संकीर्तन, एक समय भोजन, भूमि शयन, अग्नि सेवन न कराना। कल्पवास में सबसे ज्यादा महत्व ब्रह्मचर्य, व्रत एवं उपवास, देव पूजन, सत्संग, दान का है।
कल्पवास के दौरान साफ सुथरे श्वेत वस्त्रों को धारण करना चाहिए। पीले एव सफेद रंग का वस्त्र श्रेष्ठकर होता है। इस प्रकार से आचरण कर मनुष्य अपने अंत:करण एवं शरीर दोनों का कायाकल्प कर सकता है।
एक माह तक चलने वाले कल्पवास के दौरान कल्पवासी को जमीन पर सोना पड़ता है। इस दौरान श्रद्धालु फलाहार, एक समय का आहार या निराहार रहते हैं। कल्पवास करने वाले व्यक्ति को नियमपूर्वक तीन समय गंगा स्नान और यथासंभव भजन-कीर्तन, प्रभु चर्चा और प्रभु लीला का दर्शन करना चाहिए। कल्पवास की शुरुआत करने के बाद इसे 12 वर्षों तक जारी रखने की परंपरा रही है।
कल्पवास की शुरुआत के पहले दिन तुलसी और शालिग्राम की स्थापना और पूजन होती है। कल्पवासी अपने टेंट के बाहर जौ का बीज रोपित करता है। कल्पवास की समाप्ति पर इस पौधे को कल्पवासी अपने साथ ले जाता है। जबकि तुलसी को गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है।
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