13 फरवरी को भीष्माष्टमी
माघ मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी को भीष्माष्टमी व्रत मनाया जाता है। यह व्रत इस वर्ष 13 फरवरी 2019 को है। यह व्रत महाभारत के भीष्म पितामह की पुण्य तिथि के रूप मे मनाया जाता है। माघ मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि को ही भीष्म पितामह ने अपने शरीर को छोड़ा था।
भीष्माष्टमी के दिन तिल, जल और कुश से भीष्म पितामह के निमित्त तर्पण करने का विधान है। इससे मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य को पितृ दोष से मुक्ति मिलती है। यह व्रत संस्कारी और सुयोग्य संतान की प्राप्ति वाला है। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है। प्रात:काल उठकर नित्य कर्म से निवृत हों स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर लें। किसी नदी या जलाशय में स्नान करना अति उत्तम है।
हिन्दू धर्म के पवित्र माह माघ में एक के बाद एक कई त्यौहार आते हैं। मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या, बसंत पंचमी और अब भीष्म अष्टमी। इस तिथि पर व्रत करने का विशेष महत्व होता है। माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने से सारे कष्ट और पाप नष्ट हो जाते हैं।
महाभारत के सबसे प्रबल योद्धाओं में से एक थे भीष्म पितामह जो हस्तिनापुर के राजा शांतनु और देवनदी गंगा के पुत्र थे। भीष्म पितामह ने महाभारत की लड़ाई में कौरवों की ओर से युद्ध किया था। उन्हें अपने पिता से इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था। पुराणों में बताया गया है कि युद्ध के मैदान में जब भीष्म पितामह को तीर लगे, वह समय मलमास का था जो शुभ कार्यों के लिए उत्तम नहीं होता है।
अर्जुन ने शिखंडी की आड़ में भीष्म पर इस कदर बाण वर्षा की कि उनका शरीर बाणों से बंध गया और वह बाण शय्या पर लेट गए किंतु उन्होंने अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति और प्रभु कृपा के चलते मृत्यु को धारण नहीं किया क्योंकि उस समय सूर्य दक्षिणायन था। जैसे ही सूर्य ने मकर राशि में प्रवेश किया और सूर्य उत्तरायण हो गया, भीष्म ने अर्जुन के बाण से निकली गंगा की धार पान कर प्राण त्याग, मोक्ष प्राप्त किया।
पितृदोष व पुण्य के लिए रखें व्रत
पितृदोष से मुक्ति हो या फिर संतान की प्राप्ति के लिए यह व्रत काफी महत्व रखता है क्योंकि महाभारत के सभी पात्रों में भीष्म पितामह विशिष्ट स्थान रखते हैं। कहा जाता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। भीष्म अष्टमी पर जल में खड़े होकर ही सूर्य को अघ्र्य देना चाहिए। पुराणों के मुताबिक उन्होंने अपने पिता की खुशी के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया। साथ ही उन्हें न्यायप्रिय, सत्यनिष्ठ एवं गंगापुत्र के रूप में भी जाना जाता है।
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