23. वेद : प्रसन्नता के उपाय
लगातार..........
मानव सुखी तब ही रह सकता है, जब उसका मन उत्तम हो, जब वह प्रसन्न रहे, सुखों की उस पर सदा वर्षा होती रहे. इसके लिए यह आवश्यक है कि वह भौतिक सुखों की ओर न भाग कर वास्तविक सुख के साधनों को ग्रहण करने का संयोजन का प्रयत्न करता रहे। इस सम्बन्ध में ऋग्वेद का यह मन्त्र खुले स्वर से हमारा मार्गदर्शन करते हुए उपदेश कर रहा है कि-
विश्वदानीं सुमनस: स्याम पश्येम नु सूर्यमुच्चरन्तम्।
तथा करद्वसुपतिर्वसूनां देवाँ ओहानौवसागमिष्ठ।। ऋग्वेद 6.52.577
मन्त्र उपदेश करते हुए हमारा मार्गदर्शन कर रहा है और कह रहा है कि हम सदा उत्तम मन वाले हों तथा सदा प्रसन्न रहने वाले हों। मन्त्र कह रहा है कि प्रसन्न रहने की औषध है उत्तम मन. जिसका मन उत्तम है, भौतिक क्रियाओं से बचा हुआ है, कभी किसी का बुरा करने का सोचता नहीं है, बुराइयों से बचा हुआ है, उसे कभी कोई कष्ट क्लेश नहीं घेर सकता. इसलिए इस प्रकार का व्यक्ति सुखी होता है प्रसन्न होता है। निराशा कभी उत्तम मन वाले प्राणी को कभी छू भी नहीं सकती। इसलिए हे मानव! तू उत्तम मन वाला बन कर सदा प्रसन्न रह। हम ज्ञान रूपी सूर्य को सदा उदित होते हुए देखें। हम जानते हैं कि सब क्रियाओं का मूल ज्ञान है और मन्त्र इस ज्ञान को सदा अपने अन्दर उदय होने का उपदेश कर रहा है। जब हम वेद रूपी ज्ञान का सूर्य अपने अन्दर उदय कर पाने में सक्षम होंगे तो हम उत्तम प्रसन्न रह सकेंगे प्रसन्न रह सकेंगे।
मन्त्र हमें परमपिता परमात्मा की सदा प्रार्थना करने का उपदेश दे रहा है और कह रहा है कि वह प्रभु सब प्रकार के एश्वर्यों का स्वामी है। पृथ्वी आदि जितनी भी वस्तुएं हमें दिखाई दे रही हैं, उन सब का आधार भी वह प्रभु ही है। इस कारण ही हमारा अस्तित्व है। यदि यह न हो तो हमारा अस्तित्व ही संभव नहीं है। इस सब के होने से ही हमारी प्रसन्नता संभव हो पाती है। इसलिए हम सदा उस प्रभु की सेवा में ही रहें। हम उस सर्वशक्तिमान प्रभु से यह भी प्रार्थना करें कि हे पिता! आप दिव्य गुणों की वर्षा करने वाले हैं। एसी कृपा करें कि हम भी इन दिव्य गुणों को ग्रहण कर पावें। इतना ही नहीं आप हमें सदा विद्वान लोगों का सत्संग भी कराते रहें ताकि हम उनसे भी ज्ञान प्राप्त कर सकें। आप सब के रक्षक हो, आप के चरणों में रहते हुए हम भी सदा आप से रक्षित होते रहें।
इसके लिए हम अपने मन में सदा उत्तम विचार रखें। सदा प्रसन्न रहें। वेद ने हमें यह आदेश क्यों दिया है? स्पष्ट है कि उत्तम विचारों वाला मन ही सुख, शांति तथा धन एश्वर्य की प्राप्ति का साधन है. यही प्रसन्नता का साधन है एक प्रसन्न मन वाला व्यक्ति कभी दु:खी नहीं हो सकता। जब मन के अन्दर असत्य, ईष्र्या, द्वेष, छल कपट सरीखे विचार जब तक मन में रहेंगे तब तक वह लड़ाई झगडा, कलह व क्लेश में उलझा रहेगा। मन में कभी शान्ति न आ पावेगी। अशांत मन कभी भी उत्तम नहीं हो सकता। वेद तो ज्ञान मूलक प्रसन्नता प्राप्ति का उपदेश करता है। मन्त्र में कहा भी है कि ज्ञान के सूर्य को हम प्रतिदिन उदय होते हुए देखें। अर्थात् हम प्रात: बिस्तर छोडऩे से लेकर रात्रि को बिस्तर में आने तक निरंतर अपने ज्ञान को बढ़ाने का प्रयास करते हुए सच्चे अर्थों में प्रसन्नता प्राप्त करने के प्रयास में रहें। सूर्य परम पिता के विशेषनात्मक नामों में से एक है। इससे इस मंत्रांश का यह भी भाव बनता है कि जो पिता सब का प्रकाशक है।
हम उस परमपिता परमात्मा को अपने हृदय के आकाश में सब स्थानों पर अनुभव करें, उसकी सच्चे ह्रदय से प्रार्थना करते हुए आशा करें कि चाहे हम दु:ख में हों या सुख में, हानि हो रही हो अथवा लाभ, विजयी हो रहे हों या पराजित, प्रत्येक अवस्था में हमारी यह प्रसन्नता बनी रहे। वह प्रभु मंगलमय है, वह प्रभु आनंद देने वाला है, वह प्रभु सुख दायक है। उस प्रभु की कृपा को पाने के लिए, उस प्रभु की दया को पाने के लिए हमें सदा निरंतर अभ्यास करने की आवश्यकता होती है।
क्रमश:
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