29. वेद : वेदांत
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वेदांत ज्ञानयोग की एक शाखा है, जो व्यक्ति को ज्ञान-प्राप्ति की दिशा में उत्प्रेरित करता है। इसका मुख्य स्रोत उपनिषद है, जो वेद और अरण्यक ग्रंथों का सार समझे जाते हैं। वैदिक साहित्य का अंतिम भाग होने के कारण उपनिषद को वेदांत कहा जाता है। वेदांत का शाब्दिक अर्थ है- वेदों (ज्ञान) का अंत (अथवा सार)। वेदांत का मुख्य विषय है आत्मा का ज्ञान या अपने आत्मस्वरूप को पहचानना। आप जानेंगे कि आप वो नहीं हैं, जो आप समझते हैं कि मैं यह हूं। बजाय इसके आप प्रत्यक-आत्मा या आत्मा हैं, उन सबसे अलग जो आप नहीं हैं। वर्तमान में आप शरीर, इंद्रियों, मन और और भी कई चीजें, जिन्हें आप अपना समझते हैं, जिनसे आप अपना तादात्म्य स्थापित करते हैं, उन सबका समुच्चय हैं। इन सब चीजों को जब आप निकाल देते हैं, तो जो रहता है, वह प्रत्यक-आत्मा है। आप वही हैं- वही परम तत्व आपके भीतर है। कोई भी पद परमात्मा या ब्रह्म से बड़ा नहीं हो सकता। वेदांत ही आपको परमात्मा से साक्षात करवाता है।
चौथा लक्ष्य मानव के चार लक्ष्य हैं-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इन्हें पुरुषार्थ कहा जाता है। अंतिम लक्ष्य-मोक्ष, सर्वोच्च लक्ष्य है, जिसे पाने में वेदांत मदद करता है।
बंधन से मुक्ति- मोक्ष का मतलब है मुक्ति। बंधन से मुक्ति। बंधन मन की वह अवस्था है, जिसमें व्यक्ति 'मैं' और 'मेरा' के रूप में सोचता है और हमेशा, दुख, चिंताएं, बेचैनी, अशांति, चीजों की तृष्णा आदि रखता है। 'मैं' और 'मेरा' की यह भावना आपकी उच्च धरातल से गिरावट को दर्शाती है। आपने, जिसके पास खुद को दायरों में बांधने की कोई सीमा नहीं होती, अपने चारों ओर घेरा बना लिया है और ' मैं'-'मेरा' के दायरे में सिमट गए हैं, इस तरह आपने अपने आपको अपनी अपरिमितता से अलग कर लिया है। जब माया या भ्रांति के कारण उत्पन्न 'मैं' और 'मेरा' का भाव दूर हो जाता है और आपमें यह चेतना आती है कि 'मैं उपाधि या मुझे दायरे में बांधने वाली बातों से स्वतंत्र हूं,' और 'मैं हर तरह से पूर्ण हूं' , तो महत्वहीन होने का विचार बिल्कुल खत्म हो जाता है, और साथ ही उत्तेजनाएं, अशांति, दुख और और भी बहुत सारी तकलीफें समूल नष्ट हो जाती हैं। इस तरह आप बंधन से मुक्त हो जाते हैं।
वेदांत से परमानंद- वेदांत से आपको खुशी और परम आनंद मिल सकता है। जब तक परमानंद का अनुभव नहीं होता, साधना से कुछ नहीं मिलेगा। कोई भी कह सकता है, 'मैं मुक्त हूं या स्वतंत्र हूं। मैंने असीम खुशी पाई है।' दरअसल हमारे भीतर परमानंद की अमूल्य दौलत होनी चाहिए। साधना करना, वेदांत पर होने वाली चर्चाओं को सुनना और इसी तरह की बातें आपके भीतर आध्यात्मिक अनुभव की दौलत जोड़ता है।
जिस व्यक्ति ने आत्मा को समझा है और जो अपने शिष्यों को आत्मस्वरूप समझने का ज्ञान दे सकता है, वह सद्गुरु है। दूसरे शब्दों में गुरु को आत्मा का प्रत्यक्ष अनुभव होना चाहिए और उनमें अपना यह अनुभव औरों को देने की क्षमता भी होनी चाहिए। चुंबकीय व्यक्तित्व, ग्रंथों पर अधिकार, अच्छा वक्ता, मानसिक शक्तियां या दूसरी योज्ताएं, इन सबको सद्गुरु होने के सूचक के रूप में नहीं ले सकते।
क्रमश:
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