नवरात्रि के नौ दिन अलग-अलग पूजा
नवरात्रि पर मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूप की तिथि अनुसार अलग-अलग स्वरूप की पूजा का विधान शास्त्रों में वर्णित है। उसी अनुरूप नवरात्रि पूजन के चौथे दिन देवी के कूष्माण्डा स्वरूप की ही उपासना की जाती है। मान्यता है कि उन्होंने अपनी हल्की हंसी से ब्रह्मांड को उत्पन्न किया था। इनकी आठ भुजाएं हैं। अपने सात हाथों में वह कमंडल, धनुष, बाण, कमल का फूल, अमृत से भरा कलश, चक्र और गदा लिए हैं। उनके आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जप माला है। पूजन मंत्र-
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कुष्मांडा शुभदास्तु मे॥
नवरात्रि का पांचवां दिन स्कंदमाता की पूजा का दिन होता है. माना जाता है कि इनकी कृपा से मूर्ख भी ज्ञानी हो जाता है। स्कंद कुमार कार्तिकेय की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता नाम से जाना जाता है। यह कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। इसीलिए इन्हें पद्मासना भी कहा जाता है। इनका वाहन सिंह है। पूजन मंत्र-
सिंहसनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी॥
मां दुर्गा के छठे स्वरूप का नाम कात्यायनी है। इनकी उपासना से भक्तों को आसानी से अर्थ (धन), धर्म, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। महर्षि कात्यायन ने पुत्री प्राप्ति की इच्छा से मां भगवती की कठिन तपस्या की। तब देवी ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। जिससे इनका यह नाम पड़ा। भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने कालिंदी यमुना के तट पर इनकी पूजा की थी। अच्छे पति की कामना से कुंवारी लड़कियां इनका व्रत रखती हैं। पूजन मंत्र-
चंद्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥
दुर्गापूजा के सातवें दिन मां कालरात्रि की उपासना का विधान है। कालरात्रि की पूजा करने से ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुल जाते हैं और सभी आसुरी शक्तियों का नाश होता है। देवी के नाम से ही पता चलता है कि इनका रूप भयानक है। इनके तीन नेत्र और शरीर का रंग एकदम काला है। इनकी कृपा से भक्त हर तरह के भय से मुक्त हो जाते हैं। पूजन मंत्र-
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता। लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा। वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥
मां दुर्गा की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। इनकी आयु आठ साल की मानी गई है। इनके सभी आभूषण और वस्त्र सफेद होने की वजह से इन्हें श्वेताम्बरधरा भी कहा गया है. कहते हैं कि शिव को पति रूप में पाने के लिए महागौरी ने कठोर तपस्या की थी। इस कारण इनका शरीर काला पड़ गया। लेकिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने इनके शरीर को गंगा जल से धोकर कांतिमय बना दिया। तब से मां महागौरी कहलाईं। इनकी उपासना से सभी पापों से मुक्ति मिलती है। पूजन मंत्र-
श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचि:। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोदया॥
नवरात्रि पूजन के नौवें दिन देवी सिद्धिदात्री की उपासना की जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वालों को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। भगवान शिव ने भी सिद्धिदात्री की कृपा से ये सभी सिद्धियां प्राप्त की थीं। इनकी कृपा से ही महादेव का आधा शरीर देवी का हुआ था और वह अद्र्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए। इनकी साधना से सभी मनोकामनाएं की पूरी हो जाती हैं। पूजन मंत्र-
या देवी सर्वभूतेषु मां सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
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